भारतीय म्यूचुअल फंड मार्केट में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। रिटेल निवेशक अब इंडेक्स फंड्स (Index Funds) की तरफ तेजी से शिफ्ट हो रहे हैं और पैसिव निवेश का कुल AUM **₹15.15 लाख करोड़** तक पहुंच गया है।
भारतीय म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में निवेश का तरीका पूरी तरह बदल रहा है। पिछले 5 सालों में रिटेल निवेशकों ने एक्टिव फंड्स के बजाय इंडेक्स फंड्स पर भरोसा दिखाया है। आंकड़ों के मुताबिक, रिटेल पैसिव पोर्टफोलियो में इंडेक्स फंड्स की हिस्सेदारी 2021 के 11.5% से बढ़कर 2026 की शुरुआत तक 55% पर पहुंच गई है।
SIP का बढ़ा दबदबा
यह बदलाव पैसिव इन्वेस्टिंग की बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है, जिसका कुल AUM जुलाई 2026 तक करीब ₹15.15 लाख करोड़ रहा। यह पूरी म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री का 18% हिस्सा है। इस उछाल के पीछे सबसे बड़ी वजह मासिक SIP (Systematic Investment Plan) है, जिसका कलेक्शन मार्च 2026 में ₹32,000 करोड़ के पार निकल गया है। निवेशक अब कम खर्च और पारदर्शी स्ट्रेटेजी को प्राथमिकता दे रहे हैं।
डायवर्सिफिकेशन और संस्थागत रुझान
इक्विटी इंडेक्स फंड्स के साथ-साथ निवेशक गोल्ड ETFs (Gold ETFs) में भी पैसा लगा रहे हैं। हालांकि, अभी भी कॉर्पोरेट निवेशकों के पास पैसिव एसेट्स का बड़ा हिस्सा है, लेकिन HNIs और रिटेल निवेशकों की बढ़ती भागीदारी के कारण यह अंतर धीरे-धीरे कम हो रहा है।
रेगुलेटरी रिस्क और सावधानी
मार्केट में एक ही तरह के कई फंड्स की बाढ़ आ गई है, जिससे एकाग्रता (Concentration) का जोखिम बढ़ गया है। SEBI अब इस पर कड़ी नजर रख रहा है और जल्द ही प्रति कैटेगरी नए फंड लॉन्च की संख्या पर सीमा लगा सकता है। रेगुलेटर का मानना है कि ज्यादा विकल्प निवेशकों को भ्रमित कर सकते हैं। इसके अलावा, पैसिव फंड्स में बढ़ती भागीदारी के कारण बाजार में अस्थिरता के दौरान रिटेल सेंटिमेंट का असर भी अधिक देखने को मिल सकता है, इसलिए निवेश से पहले फंड की संरचना को समझना जरूरी है।
