2026 में एक्टिव फंड्स के लिए राह मुश्किल
2026 में ग्लोबल इकोनॉमी (Global Economy) अनिश्चितता, बदलते जियोपॉलिटिकल (Geopolitical) हालात और अलग-अलग सेंट्रल बैंक की नीतियों से जूझ रही है। कमोडिटी प्राइसेस (Commodity Prices) में उठापटक है, और भले ही भारत की जीडीपी (GDP) ग्रोथ 7.3% रहने का अनुमान है, लेकिन कई विकसित देशों की ग्रोथ धीमी पड़ रही है। ऐसे में एक्टिव (Active) बनाम पैसिव (Passive) इन्वेस्टिंग की बहस और तेज़ हो गई है, जिसमें पैसिव स्ट्रैटेजीज़ (Passive Strategies) सीधे तौर पर बाज़ी मार रही हैं। 2025 में, एक्टिव इक्विटी फंड्स (Active Equity Funds) से लगातार 11वें साल $1 ट्रिलियन से ज़्यादा का आउटफ्लो (Outflow) देखा गया, जबकि पैसिव ईटीएफ (Passive ETFs) ने $600 बिलियन से ज़्यादा की रकम खींची। मॉर्निंगस्टार (Morningstar) के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में केवल 38% एक्टिव फंड्स ही अपने पैसिव बेंचमार्क (Passive Benchmarks) को मात दे पाए। एक्टिव फंड मैनेजर्स के लिए लगातार 'अल्फा' यानी बाज़ार से ज़्यादा रिटर्न जनरेट करना अब और भी कठिन हो गया है। हालांकि, लॉन्ग/शॉर्ट इक्विटी (Long/Short Equity) जैसी कुछ खास स्ट्रेटेजीज़ अस्थिर बाज़ारों में अच्छा कर सकती हैं, पर कुल मिलाकर, एक्टिव स्टॉक पिकर्स (Active Stock Pickers) संघर्ष कर रहे हैं।
बेहतर फंड चुनने के ज़रूरी फ़िल्टर
पैसिव इन्वेस्टिंग के इस बढ़ते चलन के बावजूद, म्यूचुअल फंड्स का चयन करते समय कुछ मुख्य फ़िल्टर अब भी बेहद ज़रूरी हैं। लंबी अवधि की कंसिस्टेंसी (Long-term return consistency), जिसे 5 या 10 साल के सीएजीआर (CAGR) से मापा जाता है, महत्वपूर्ण है, क्योंकि अस्थिर बाज़ारों में छोटे समय के नतीजे भ्रामक हो सकते हैं। रोलिंग रिटर्न्स (Rolling returns) फंड की रणनीति की गहराई दिखाते हैं। ये बताते हैं कि फंड ने अलग-अलग समयावधियों में कितनी बार अपने बेंचमार्क को हराया है, जो एक स्थिर रणनीति का संकेत देता है। रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न्स (Risk-adjusted returns), जैसे कि शार्प रेश्यो (Sharpe Ratio) का इस्तेमाल करके, यह जानना ज़रूरी है कि आप जोखिम की हर इकाई के लिए कितना अतिरिक्त रिटर्न पा रहे हैं, खासकर 2026 की शुरुआत के बाज़ार उतार-चढ़ाव को देखते हुए। एक्सपेंस रेश्यो (Expense ratio) एक बड़ा फैक्टर बना हुआ है जो लंबी अवधि के मुनाफे को कम करता है; छोटे-छोटे अंतर भी जुड़कर बड़े हो जाते हैं, इसलिए कम फीस वाले फंड ज़्यादा आकर्षक लगते हैं। फंड मैनेजर का ट्रैक रिकॉर्ड (Fund manager's track record) और फंड के साथ उनका कार्यकाल उनकी कुशलता का अंदाज़ा दे सकता है, हालांकि लगातार अल्फा खोजना अभी भी कठिन है। डाइवर्सिफिकेशन (Diversification) तेज़ी से बदलते बाज़ारों में सेक्टर-विशिष्ट जोखिमों को कम करने में मदद करता है। अंत में, डाउनसाइड प्रोटेक्शन (Downside protection), जिसे डाउनसाइड कैप्चर (Downside capture) जैसे रेश्यो से मापा जाता है, ऐसे फंड्स की पहचान करता है जो गिरावट के दौरान कैपिटल (Capital) को बचाते हैं, जिससे निवेशकों को निवेशित रहने में मदद मिलती है।
फ़िल्टर के बावजूद बना रहेगा जोखिम
हालांकि, 2026 में एक्टिव म्यूचुअल फंड्स चुनते समय मज़बूत फ़िल्टर भी जोखिम को पूरी तरह खत्म नहीं करते। पैसिव फंड्स का स्थिर प्रदर्शन और फीस चुकाने के बाद भी एक्टिव फंड्स का बेंचमार्क को मात देने का लगातार संघर्ष, यह दर्शाता है कि कई फंड्स असल अल्फा नहीं दे पाएंगे। कुछ एक्टिव फंड्स असल में 'क्लोजेट इंडेक्सर्स' (Closet Indexers) की तरह काम करते हैं - वे बेंचमार्क को करीब से ट्रैक करते हैं लेकिन ज़्यादा फीस वसूलते हैं, जिससे कोई अतिरिक्त फायदा नहीं मिलता। उपलब्ध फंड्स की इतनी बड़ी संख्या और उनमें ज़्यादा अंतर न होने के कारण, वास्तव में असाधारण एक्टिव मैनेजमेंट को खोजना बेहद मुश्किल है। फंड मैनेजर के पिछले प्रदर्शन पर भरोसा करना भी भ्रामक हो सकता है; बाज़ार की स्थितियां बदलती हैं, जिससे पुरानी स्ट्रेटेजीज़ अप्रभावी हो जाती हैं। कुछ मेगा-कैप स्टॉक्स (Mega-cap stocks) में भारी निवेश, जो कुछ पैसिव इंडेक्स (Passive Indexes) के लिए अच्छा है, अन्य एक्टिव पोर्टफोलियो (Active Portfolios) में कमजोरियों को छिपा सकता है।
2026 के फंड निवेशकों के लिए रणनीतिक कदम
2026 की ओर देखते हुए, पैसिव इन्वेस्टिंग की ओर मज़बूत झुकाव और एक्टिव फंड्स की अल्फा पैदा करने की चुनौती, स्पष्ट रणनीतियों की मांग करती है। भारत का शेयर बाज़ार अपनी मज़बूत जीडीपी ग्रोथ के साथ उम्मीद जगाता है, लेकिन वैश्विक अनिश्चितता और अलग-अलग मौद्रिक नीतियां बाज़ारों को हिलाती रहेंगी। अंतर्राष्ट्रीय स्टॉक्स (International stocks), जिन्होंने 2025 में अमेरिकी स्टॉक्स से बेहतर प्रदर्शन किया था, उपयोगी डाइवर्सिफिकेशन (Diversification) प्रदान करते हैं। समझदार निवेशकों को केवल फंड फ़िल्टर से आगे बढ़कर अपनी समग्र एसेट एलोकेशन (Asset allocation) का रणनीतिक मूल्यांकन करना चाहिए। पैसिव फंड्स की कम लागत और व्यापक बाज़ार पहुंच को, कम कुशल बाज़ारों या फिक्स्ड इनकम (Fixed Income) जैसे क्षेत्रों में संभावित अल्फा-जनरेटिंग एक्टिव स्ट्रैटेजीज़ के साथ जोड़ना एक बेहतर तरीका हो सकता है। अनुशासित, डेटा-संचालित निर्णय लेना जो एक्टिव मैनेजमेंट की बदलती चुनौतियों को स्वीकार करते हैं, समय के साथ धन बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।