भारत में पैसिव म्यूचुअल फंड का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है। अब इनका कुल एसेट बेस (AUM) **₹15.15 लाख करोड़** तक पहुंच गया है, जो पूरी इंडस्ट्री के **₹85.76 लाख करोड़** के एसेट का करीब **18%** है।
भारत का म्यूचुअल फंड उद्योग एक बड़े मुकाम पर है। जुलाई 2026 तक पैसिव स्कीम्स का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) ₹15.15 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। पिछले साल यह आंकड़ा ₹12.18 लाख करोड़ था, जो दिखाता है कि रिटेल और इंस्टीट्यूशनल निवेशक अब अपने पोर्टफोलियो को मैनेज करने के लिए पैसिव रूट को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं।
पैसिव इन्वेस्टमेंट का बढ़ता दौर
निवेशकों का झुकाव पैसिव फंड्स की ओर बढ़ने की सबसे बड़ी वजह 'कॉस्ट-एफिशिएंसी' है। इंडेक्स फंड्स और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETFs) का एक्सपेंस रेशियो एक्टिव फंड्स के मुकाबले काफी कम होता है। पैसिव सेगमेंट में डोमेस्टिक इक्विटी फंड्स का दबदबा है, जो कुल पैसिव एसेट्स का करीब 68.4% हिस्सा रखते हैं। इसके अलावा, गोल्ड और सिल्वर ETFs ने भी इस ग्रोथ में बड़ा योगदान दिया है।
साथ ही, एक्टिव लार्ज-कैप फंड्स का प्रदर्शन अक्सर अपने बेंचमार्क को मात देने में संघर्ष कर रहा है, जिसके चलते निवेशक अब बाजार के रिटर्न को सीधे ट्रैक करने वाले फंड्स को चुन रहे हैं।
रिस्क और ध्यान रखने वाली बातें
पैसिव फंड्स सस्ते और पारदर्शी जरूर हैं, लेकिन इनमें भी कुछ जोखिम हैं। निवेशकों को 'ट्रैकिंग एरर' पर खास नजर रखनी चाहिए। अगर फंड के रिटर्न और इंडेक्स के रिटर्न में ज्यादा अंतर आता है, तो यह आपकी उम्मीदों के मुताबिक रिटर्न नहीं दे पाएगा।
इसके अलावा, पैसिव फंड्स सीधे मार्केट वोलेटिलिटी के प्रति संवेदनशील होते हैं। बाजार गिरने पर ये फंड भी गिरते हैं, क्योंकि यहां कोई फंड मैनेजर एक्टिवली बचाव नहीं करता। हाल के आंकड़ों में डेट-बेस्ड पैसिव फंड्स से आउटफ्लो भी देखा गया है, जो ब्याज दरों और लिक्विडिटी में बदलाव के प्रति उनकी संवेदनशीलता दिखाता है। साथ ही, SEBI के बदलते नियमों और कैटेगरी फ्रेमवर्क पर भी नजर रखना जरूरी है। भविष्य में निवेशक 'हाइब्रिड अप्रोच' अपना सकते हैं, जहां बेस रिटर्न के लिए पैसिव और एक्स्ट्रा गेन्स के लिए एक्टिव फंड्स का कॉम्बिनेशन इस्तेमाल किया जाएगा।
