पैसिव फंड्स का जलवा: सेक्टोरल और थीमैटिक ETFs की बढ़ी डिमांड

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AuthorNeha Patil|Published at:
पैसिव फंड्स का जलवा: सेक्टोरल और थीमैटिक ETFs की बढ़ी डिमांड

भारत में पैसिव निवेश का बाजार बदल रहा है। म्यूचुअल फंड हाउस अब फार्मा और डिफेंस जैसे खास सेक्टर्स के लिए इंडेक्स फंड और ETFs लॉन्च कर रहे हैं। ये कम लागत वाले तो हैं, लेकिन इनमें टाइमिंग और कंसंट्रेशन का रिस्क भी है।

पैसिव निवेश में नया ट्रेंड

भारत में पैसिव निवेश का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। पहले जहां निवेशक सिर्फ निफ्टी 50 या सेंसेक्स जैसे ब्रॉड इंडेक्स तक सीमित थे, वहीं अब म्यूचुअल फंड हाउस बैंकिंग, मेटल, एनर्जी, केमिकल और डिफेंस जैसे खास सेक्टर्स को ट्रैक करने वाले कई तरह के इंडेक्स फंड और एक्सचेंज-ट्रैडेड फंड (ETFs) पेश कर रहे हैं। ये नए प्रोडक्ट्स एक्टिव फंड्स की तुलना में कम लागत पर निवेशकों को खास इंडस्ट्रीज में निवेश का मौका दे रहे हैं।

सेक्टर्स पर क्यों बढ़ रहा है फोकस?

इस बदलाव की मुख्य वजह कुछ खास सेक्टर्स का हालिया शानदार प्रदर्शन है, जिन्होंने ब्रॉड मार्केट को पीछे छोड़ दिया है। फरवरी से जुलाई 2026 के बीच, जहां निफ्टी 50 TRI में 3.3% की गिरावट आई, वहीं निफ्टी फार्मा TRI 22% और निफ्टी हेल्थकेयर TRI 20.8% तक चढ़ गया। ऐसे रिटर्न ने स्वाभाविक रूप से निवेशकों का ध्यान इन हाई-परफॉर्मिंग सेक्टर्स पर केंद्रित कर दिया है।

लागत और संरचना का ध्यान

इन पैसिव प्रोडक्ट्स का एक बड़ा फायदा लागत-दक्षता है। इन फंडों के एक्सपेंस रेशियो (Expense Ratio) आम तौर पर 0.14% से 0.50% के बीच होते हैं। चूंकि ये फंड पैसिव होते हैं, इनका लक्ष्य किसी इंडेक्स को हूबहू कॉपी करना होता है, न कि फंड मैनेजर की स्टॉक-पिकिंग रणनीति पर निर्भर रहना। इससे मैनेजर की गलती या अंडरपरफॉर्मेंस का जोखिम खत्म हो जाता है।

हालांकि, निवेशकों को यह समझना चाहिए कि ये इंडेक्स कैसे बनते हैं। ज्यादातर मार्केट-कैपिटलाइजेशन-वेटेड (Market-capitalization-weighted) तरीके का पालन करते हैं, जिसका मतलब है कि कुछ बड़ी कंपनियां फंड के प्रदर्शन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती हैं। उदाहरण के लिए, निफ्टी इंडिया डिफेंस इंडेक्स में, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स (Hindustan Aeronautics) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (Bharat Electronics) जैसी कंपनियां भारी वेटेज रखती हैं। इसके अलावा, कुछ सेक्टर इंडेक्स बहुत संकीर्ण होते हैं, जिनमें सिर्फ 10 कंपनियां भी शामिल हो सकती हैं, जिससे किसी एक स्टॉक की अस्थिरता का असर बढ़ जाता है।

जोखिम और सामरिक उपयोग

पैसिव सेक्टर फंड्स की अपनी चुनौतियां हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि सेक्टर्स स्वाभाविक रूप से साइक्लिकल (Cyclical) होते हैं, जिसका मतलब है कि वे ग्रोथ और मंदी के दौर से गुजरते हैं। यदि कोई निवेशक किसी इंडस्ट्री के अपने चरम पर होने पर उसमें निवेश करता है, तो उसे लंबे समय में खराब रिटर्न मिल सकता है। इसके अलावा, निवेशकों को ट्रैकिंग एरर (Tracking Error)—इंडेक्स के प्रदर्शन और फंड के वास्तविक रिटर्न के बीच का अंतर—पर भी ध्यान देना चाहिए, खासकर नए फंड हाउसों का मूल्यांकन करते समय।

अधिकांश निवेशकों के लिए, इंडेक्स फंड्स को मैनेज करना आसान होता है क्योंकि उन्हें डीमैट अकाउंट (Demat Account) की जरूरत नहीं होती और वे एसआईपी (SIP) को सपोर्ट करते हैं। ETFs इंट्रा-डे ट्रेडिंग (Intra-day trading) की सुविधा देते हैं, लेकिन ब्रोकरेज फीस, बिड-आस्क स्प्रेड (Bid-ask spreads) और इंपैक्ट कॉस्ट (Impact costs) जैसे अतिरिक्त खर्चों के साथ आते हैं। फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स आमतौर पर इन फंड्स को सैटेलाइट होल्डिंग्स (Satellite holdings) के रूप में इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं, जिनका पोर्टफोलियो में हिस्सा 15-20% से ज्यादा नहीं होना चाहिए। जो लोग सेक्टर साइकिल को सक्रिय रूप से मॉनिटर नहीं कर सकते, उनके लिए डाइवर्सिफाइड इक्विटी फंड्स (Diversified equity funds), जहां प्रोफेशनल एसेट एलोकेशन (Asset allocation) का ध्यान रखते हैं, एक अधिक स्थिर विकल्प बना हुआ है। निवेशकों को आवंटन निर्णय लेने से पहले इन फंडों की पोर्टफोलियो कंसंट्रेशन (Portfolio concentration) और ट्रैकिंग एरर पर करीब से नजर रखनी चाहिए।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.