निवेशकों के लिए पोर्टफोलियो मैनेजर के जरिए म्यूचुअल फंड्स में निवेश का नया रास्ता 'PRIM' खुल गया है। ₹25 लाख के न्यूनतम निवेश के साथ, यह उन लोगों के लिए एक विकल्प है जो पारंपरिक PMS की ऊंची लागत से बचना चाहते हैं, लेकिन इसमें फीस और टैक्स के पेच को समझना जरूरी है।
भारत में निवेश का एक नया रास्ता खुल गया है, जिसे 'पोर्टफोलियो मैनेजर्स रूट फॉर इन्वेस्टिंग इन म्यूचुअल फंड यूनिट्स' यानी PRIM कहा जा रहा है। ₹25 लाख की एंट्री लिमिट के साथ, यह उन निवेशकों के लिए एक बड़ा मौका है, जो पारंपरिक पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) की ₹50 लाख वाली ऊंची सीमा के कारण वहां नहीं पहुंच पाते थे, लेकिन प्रोफेशनल गाइडेंस चाहते हैं।
यह PMS से कैसे अलग है?
पारंपरिक PMS में मैनेजर सीधे स्टॉक्स या बॉन्ड्स खरीदता है, लेकिन PRIM एक 'रैपर' की तरह काम करता है। यहां पोर्टफोलियो मैनेजर का काम इंडेक्स फंड्स, ETFs और डायरेक्ट प्लान्स का एक बास्केट तैयार करना है। यह मॉडल रिस्क को कम रखने और बेहतर एसेट एलोकेशन के लिए डिजाइन किया गया है।
लागत (Cost Structure) का गणित
यहाँ निवेशकों को सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि इसमें दोहरी लागत (double-layer cost) लगती है:
- मैनेजमेंट फीस: पोर्टफोलियो मैनेजर 1% तक फिक्स्ड फीस और परफॉरमेंस आधारित फीस ले सकता है।
- म्यूचुअल फंड एक्सपेंस: इसके अलावा, जिन म्यूचुअल फंड्स में पैसा लगा है, उनका अपना एक्सपेंस रेशियो भी देना होगा।
निवेशकों को सिर्फ मैनेजर की फीस नहीं, बल्कि 'टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप' पर गौर करना चाहिए, क्योंकि यह नेट रिटर्न को काफी प्रभावित कर सकती है।
टैक्स का नया सिरदर्द
चूंकि PRIM में मैनेजर अक्सर पोर्टफोलियो को री-बैलेंस करता है, इसलिए हर बार फंड बदलने पर 'कैपिटल गेन्स टैक्स' ट्रिगर हो सकता है। यह सामान्य 'बाय एंड होल्ड' रणनीति के मुकाबले आपके टैक्स बोझ को बढ़ा सकता है, जिसके लिए बेहतर रिकॉर्ड-कीपिंग जरूरी है।
अंत में, यह रूट अभी केवल घरेलू म्यूचुअल फंड्स तक सीमित है। निवेश करने से पहले यह देखना सबसे जरूरी है कि क्या आपका मैनेजर तमाम टैक्स और फीस चुकाने के बाद मार्केट से बेहतर रिटर्न दे पा रहा है या नहीं।
