Nifty 50 इंडेक्स गिरकर **22,231.80** के स्तर पर पहुंच गया है, जो कि पिछले **18 महीनों** का निचला स्तर है। बाजार की इस उठापटक के बीच भी निवेशक अपनी पोर्टफोलियो में Nifty 50 ETFs को प्राथमिकता दे रहे हैं।
बाजार में जारी गिरावट के बीच 8 अक्टूबर 2026 को Nifty 50 इंडेक्स 22,231.80 पर बंद हुआ, जो पिछले 18 महीनों का सबसे निचला स्तर है। अपने 52-हफ्तों के हाई 26,373.20 से इंडेक्स अब 15.7% नीचे फिसल चुका है। पिछले 9 हफ्तों से लगातार जारी इस गिरावट के पीछे बढ़ती ब्याज दरें, महंगाई का दबाव और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की निरंतर बिकवाली मुख्य कारण है।
वैल्युएशन और बाजार की स्थिति
लंबे समय के नजरिए से देखें तो हालिया करेक्शन के बाद Nifty 50 का वैल्युएशन अब अधिक आकर्षक नजर आ रहा है। मौजूदा समय में इंडेक्स का प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) रेशियो लगभग 19.0 पर है, जो कि इसके 5 साल के मीडियन 21.9 से काफी कम है। हालांकि, कम P/E रेशियो बाजार में तुरंत रिकवरी की गारंटी नहीं देता, क्योंकि आने वाली तिमाही नतीजों पर अभी भी मैक्रो-इकोनॉमिक दबाव बना हुआ है।
Nifty 50 ETFs देश की 50 सबसे बड़ी और लिक्विड कंपनियों में निवेश का मौका देते हैं। इनमें वित्तीय सेवाओं (Financial Services) का वेटेज 35% से 37% के आसपास है, जो निवेशकों को एक डायवर्सिफाइड पोर्टफोलियो देता है।
ETFs से जुड़े जोखिम और चुनौतियां
निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि ETF में 'ट्रैकिंग एरर' (Tracking Error) जैसा जोखिम होता है। इसके अलावा, एक्सपेंस रेशियो और अंडरलाइंग शेयरों की लिक्विडिटी का भी रिटर्न पर असर पड़ता है। चूंकि ये फंड बाजार से जुड़े होते हैं, इसलिए बाजार के और नीचे जाने पर ये भी प्रभावित होते हैं।
फिलहाल, समझदार निवेशक 'मैकेनिकल एक्युमुलेशन' (Mechanical Accumulation) की रणनीति अपना रहे हैं, यानी बाजार में गिरावट के दौरान धीरे-धीरे खरीदारी करना। आने वाले समय में बाजार की स्थिरता केंद्रीय बैंकों की ब्याज दरों और तिमाही नतीजों पर निर्भर करेगी।
