बाजार में इन दिनों बड़े शेयरों यानी लार्ज-कैप (Large-Cap) कंपनियों के वैल्युएशन मिड और स्मॉल-कैप के मुकाबले काफी आकर्षक दिख रहे हैं। Nifty 100 इस वक्त **18-19x** के P/E रेशियो पर ट्रेड कर रहा है, जबकि स्मॉल-कैप इंडेक्स **31-32x** के ऊंचे स्तर पर हैं।
वैल्युएशन का बड़ा अंतर
इन्वेस्टर्स के लिए इस समय मार्केट में एक स्पष्ट विभाजन दिख रहा है। डेटा के मुताबिक, Nifty 100 इंडेक्स का P/E रेशियो 18 से 19 गुना के आसपास है। वहीं दूसरी तरफ, Nifty Midcap 150 इंडेक्स 24-25 गुना और Smallcap 250 इंडेक्स 31-32 गुना के महंगे वैल्युएशन पर कारोबार कर रहे हैं। इसका सीधा मतलब है कि बाजार छोटी कंपनियों के मुनाफे के मुकाबले बड़ी कंपनियों के मुनाफे को सस्ती कीमत पर बेच रहा है।
मुनाफे पर किसका कब्जा?
यह ट्रेंड तब और अहम हो जाता है जब हम प्रॉफिट की बात करते हैं। देश की शीर्ष 100 कंपनियां कुल कॉरपोरेट मुनाफे का लगभग 65 से 70 प्रतिशत हिस्सा जनरेट करती हैं। इसके बावजूद, इन्वेस्टर्स का झुकाव अक्सर छोटी कंपनियों की तरफ रहता है, जो केवल तेजी की उम्मीद पर टिका है, न कि वर्तमान कमाई की स्थिरता पर।
रिस्क और अनुशासन का सबक
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि सफल निवेश के लिए कंपनी के बिजनेस स्वास्थ्य और उसकी फंडामेंटल कमाई पर ध्यान देना जरूरी है। केवल ग्रोथ के अनुमानों पर दांव लगाना जोखिम भरा हो सकता है। ऐतिहासिक रूप से देखें तो बाजार में करेक्शन के दौरान उन्हीं कंपनियों को ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है जिनका वैल्युएशन उनकी असली कमाई से कहीं ज्यादा बढ़ गया था।
टेक्नोलॉजी सेक्टर की नई राह
एक बड़ा फर्क टेक्नोलॉजी सेक्टर में भी दिख रहा है। जहां अमेरिका में AI इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भारी-भरकम कर्ज लिया जा रहा है, वहीं भारतीय कंपनियां अपने इंटरनल कैश फ्लो से ही निवेश कर रही हैं। यह अनुशासित तरीका कंपनियों को कर्ज के बोझ से बचाता है और उन्हें मार्केट की अस्थिरता से सुरक्षा कवच देता है।
आने वाले समय में निवेशकों के लिए सबसे बड़ा 'मॉनिटरेबल' फैक्टर यह होगा कि क्या लार्ज-कैप कंपनियां अपना दबदबा कायम रख पाती हैं और क्या मिड व स्मॉल-कैप कंपनियां अपने ऊंचे वैल्युएशन को भविष्य के मुनाफे में बदल पाती हैं या नहीं।
