स्मॉल-कैप म्यूचुअल फंड की दुनिया में Abakkus और Helios ने एंट्री मार ली है। दोनों फंड्स ने अपने लॉन्च के एक साल के भीतर करीब ₹1,000 करोड़ का AUM (Assets Under Management) पार कर लिया है, लेकिन इनकी इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजी बिल्कुल अलग हैं। अब निवेशकों के पास एक तरफ जहां लिमिटेड स्टॉक्स में पैसा लगाने वाला, थोड़ा कैश रखने वाला ऑप्शन है, वहीं दूसरी तरफ ज्यादा स्टॉक्स वाले, फुल इन्वेस्टेड पोर्टफोलियो का ऑप्शन भी मौजूद है।
स्मॉल-कैप सेगमेंट में दो नए खिलाड़ी
भारतीय म्यूचुअल फंड बाजार में हाल ही में दो नए स्मॉल-कैप फंड्स, Abakkus Small Cap Fund और Helios Small Cap Fund, लॉन्च हुए हैं। दोनों ही फंड्स ने अपने ऑपरेशन के पहले साल में लगभग ₹1,000 करोड़ का AUM जुटा लिया है। हालांकि दोनों का फोकस स्मॉल-कैप सेगमेंट पर है, लेकिन पोर्टफोलियो बनाने और रिस्क मैनेज करने के तरीके में ये काफी अलग हैं, जिससे निवेशकों को इस सेगमेंट में पैसा लगाने के दो नए रास्ते मिले हैं।
पोर्टफोलियो में बड़ा अंतर
दोनों फंड्स के बीच मुख्य अंतर स्टॉक चुनने और कैश रिजर्व को मैनेज करने में है। Abakkus, जिसने मार्च 2026 में शुरुआत की थी, एक कंसन्ट्रेटेड (सीमित) पोर्टफोलियो पर फोकस करता है। इसके पोर्टफोलियो में 62 स्टॉक्स हैं और यह लगभग 14% कैश रिजर्व रखता है। फंड ने अपने असेट्स का एक छोटा हिस्सा लार्ज-कैप स्टॉक्स में भी लगाया है।
इसके उलट, Helios Small Cap Fund, जो नवंबर 2025 में लॉन्च हुआ था, एक ज्यादा डाइवर्सिफाइड (विविध) रणनीति अपनाता है। इसके पोर्टफोलियो में 82 स्टॉक्स हैं और यह लगभग हमेशा पूरी तरह से मार्केट में इन्वेस्टेड रहता है। Helios ने इस स्कीम में कोई लार्ज-कैप स्टॉक नहीं रखा है, जिसका सीधा मतलब है कि यह पूरी तरह से स्मॉल-कैप सेगमेंट पर ही केंद्रित है।
अलग-अलग सेक्टर्स पर दांव
दोनों फंड्स इंडस्ट्रीज को चुनने में भी अलग-अलग राह पर चल रहे हैं। Abakkus ने फाइनेंशियल, हेल्थकेयर और इंडस्ट्रियल कंपनियों की तरफ ज्यादा झुकाव दिखाया है। वहीं, Helios ने मैन्युफैक्चरिंग, डिफेंस और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर्स पर अपना फोकस रखा है।
यह अंतर दोनों फंड्स के टॉप होल्डिंग्स में भी दिखता है। उपलब्ध डेटा के अनुसार, दोनों फंड्स की टॉप 10 होल्डिंग्स में कोई ओवरलैप नहीं है। इसका मतलब है कि स्मॉल-कैप मार्केट के अलग-अलग हिस्सों में एक्सपोजर चाहने वाले निवेशकों के लिए ये फंड्स एक-दूसरे के पूरक साबित हो सकते हैं।
नए फंड्स के जोखिम
यह सही है कि ये नए फंड्स अपनी नई रणनीतियों के साथ आए हैं, लेकिन निवेशकों को नए स्कीम्स से जुड़े जोखिमों पर भी गौर करना चाहिए। पुराने, स्थापित फंड्स के विपरीत, जिन्होंने अलग-अलग मार्केट साइकल्स में सालों तक परफॉर्मेंस दी है, इन नए फंड्स के पास ऐतिहासिक प्रदर्शन का डेटा सीमित है। स्मॉल-कैप इन्वेस्टिंग अपने आप में काफी वोलेटाइल (अस्थिर) होती है, और ये स्कीम्स अभी अपना ट्रैक रिकॉर्ड बना रही हैं।
इसके अलावा, Abakkus की तरह कैश रखने से बाजार में तेज गिरावट से कुछ हद तक सुरक्षा मिल सकती है, लेकिन यह बुल मार्केट के दौरान संभावित लाभ को भी सीमित कर सकता है, जब बाकी फंड्स पूरी तरह से इन्वेस्टेड होते हैं। वहीं, Helios की तरह पूरी तरह से इन्वेस्टेड रहने से मार्केट की चाल में पूरा फायदा मिलता है, लेकिन यह अचानक आने वाली मार्केट करेक्शन के प्रति फंड को ज्यादा एक्सपोज्ड बनाता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
इन स्कीम्स को चुनने वाले निवेशकों के लिए यह सिर्फ फंड हाउस चुनने से कहीं बढ़कर है। उन्हें यह असेस करना होगा कि उनकी रिस्क लेने की क्षमता के हिसाब से कौन सी इन्वेस्टमेंट स्टाइल - कंसन्ट्रेटेड पोर्टफोलियो विद कैश बफर या हाईली डाइवर्सिफाइड एंड फुली इन्वेस्टेड - ज्यादा सही है। निवेशकों के लिए मुख्य रूप से यह देखना होगा कि ये फंड्स मैच्योर होने पर कैसा परफॉर्म करते हैं, फंड मैनेजर्स अपनी बताई गई रणनीतियों पर कितने कंसिस्टेंट रहते हैं, और आने वाले कुछ सालों में मार्केट की वोलेटिलिटी पर पोर्टफोलियो कैसे रिएक्ट करते हैं।
