भारतीय म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में New Fund Offerings (NFOs) को लेकर निवेशकों का रुझान काफी कम हो गया है। मई 2026 में NFOs के जरिए फंड हाउसेज सिर्फ ₹471 करोड़ ही जुटा पाए, जो कि जुलाई 2025 के ₹30,416 करोड़ के मुकाबले एक बड़ी गिरावट है।
क्यों कम हो रहा है NFOs में निवेश?
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि निवेशक अब ज्यादा समझदार हो गए हैं और किसी भी नए फंड में पैसा लगाने से पहले अच्छी तरह सोच-विचार कर रहे हैं। उनकी पहली पसंद अब ऐसे म्यूचुअल फंड स्कीम्स हैं जिनका परफॉरमेंस पहले से साबित हो चुका है। कई नए निवेशक यह सोचते हैं कि नए फंड का शुरुआती प्राइस कम होने से वह सस्ता और बेहतर होगा, लेकिन फाइनेंशियल एनालिस्ट्स बताते हैं कि किसी फंड का शुरुआती यूनिट प्राइस उसके भविष्य के ग्रोथ या क्वालिटी का पैमाना नहीं है।
जोखिम भरे थीमैटिक फंड्स से दूरी
आजकल ज्यादातर NFOs नैरो, थीमैटिक या मोमेंटम-आधारित स्ट्रेटेजी वाले हैं। ये फंड्स अक्सर उन सेक्टर्स या स्टॉक्स में पैसा लगाते हैं जिन्होंने हाल ही में अच्छा प्रदर्शन किया हो। हालांकि, ऐसे फंड्स बेहतर मार्केट कंडीशंस में तेजी से रिटर्न दे सकते हैं, लेकिन इनमें वोलेटिलिटी (volatility) का खतरा भी काफी ज्यादा होता है। एक्सपर्ट्स जोर देते हैं कि ये खास तरह के प्रोडक्ट्स उन्हीं निवेशकों के लिए सही हैं जो ज्यादा रिस्क ले सकते हैं और अंडरलाइंग एसेट्स (underlying assets) की गहरी समझ रखते हैं। ज्यादातर लॉन्ग-टर्म निवेशकों के लिए, अलग-अलग मार्केट साइकल्स को झेलने का अनुभव रखने वाले स्थापित फंड्स ही बेहतर विकल्प हैं।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
जैसे-जैसे इंडस्ट्री आगे बढ़ रही है, निवेशकों के लिए यह देखना जरूरी है कि फंड की असल स्ट्रेटेजी क्या है और उसका मार्केटिंग पिच कैसा है। किसी भी नई स्कीम में निवेश करने से पहले, यह पक्का कर लें कि क्या वह फंड वाकई में कोई अनोखी स्ट्रेटेजी दे रहा है जो मार्केट में पहले से मौजूद नहीं है। इन नए थीमैटिक फंड्स के पोर्टफोलियो को देखकर निवेशक कंसंट्रेशन रिस्क (concentration risk) का अंदाजा लगा सकते हैं। आने वाले समय में, इंडस्ट्री का यह ट्रेंड नई लॉन्चिंग के 'हाइप' से हटकर, आजमाए हुए फंड मैनेजमेंट स्ट्रेटेजीज और हिस्टोरिकल डेटा की विश्वसनीयता की ओर बढ़ता दिख रहा है।
