भारत में ETF मार्केट में अब **200** से ज्यादा विकल्प मौजूद हैं। ऐसे में सही फंड का चुनाव करना बेहद जरूरी है। रिटेल निवेशकों को ट्रैकिंग एरर, एक्सपेंस रेशियो और लिक्विडिटी को जरूर परखना चाहिए, ताकि वे छिपे हुए नुकसान से बच सकें।
भारतीय म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है और अब निवेशकों के पास 200 से ज्यादा एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETFs) का एक्सेस है। हालांकि, यह वैरायटी ग्लोबल मार्केट और गोल्ड-सिल्वर जैसी कमोडिटीज में निवेश का अच्छा मौका देती है, लेकिन सही फंड का चुनाव करना चुनौती भरा हो सकता है। क्योंकि ETFs पैसिव तरीके से इंडेक्स को ट्रैक करते हैं, इसलिए कई निवेशक इसे 'एक जैसा' समझ लेते हैं। लेकिन इनका मैनेजमेंट आपके रिटर्न पर सीधा असर डालता है।
ट्रैकिंग एरर क्यों है सबसे अहम?
पैसिव फंड के लिए 'ट्रैकिंग एरर' सबसे महत्वपूर्ण पैमाना है। यह बताता है कि फंड का रिटर्न उसके इंडेक्स से कितना मैच कर रहा है। उदाहरण के लिए, अगर इंडेक्स 10% बढ़ा और आपका ETF सिर्फ 9.5% बढ़ा, तो 0.5% का अंतर 'ट्रैकिंग एरर' है। ज्यादा ट्रैकिंग एरर का मतलब है कि फंड मैनेजर इंडेक्स को ठीक से कॉपी नहीं कर पा रहा है। गोल्ड और सिल्वर जैसे कमोडिटी ETFs में यह अंतर निवेश की वैल्यू को बिगाड़ सकता है। हमेशा फंड की मंथली फैक्ट शीट देखकर इसका डेटा चेक करें।
एक्सपेंस रेशियो का असर
ETFs आम तौर पर एक्टिव फंड्स से सस्ते होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप खर्चों को नजरअंदाज कर दें। 'एक्सपेंस रेशियो' वह फीस है जो एसेट मैनेजमेंट कंपनी आपकी पूंजी संभालने के लिए लेती है। ग्लोबल इक्विटी ETFs में जहां उतार-चढ़ाव ज्यादा होते हैं, वहां एक छोटा सा एक्सपेंस रेशियो भी लंबे समय में आपके बड़े कॉर्पस पर बुरा असर डाल सकता है। निवेश से पहले समान इंडेक्स को ट्रैक करने वाले अन्य ETFs के रेशियो की तुलना जरूर करें।
लिक्विडिटी और बिड-आस्क स्प्रेड को समझें
ETFs एक्सचेंज पर ट्रेड होते हैं, इसलिए उनकी लिक्विडिटी ट्रेडिंग वॉल्यूम पर निर्भर करती है। आपको 'बिड-आस्क स्प्रेड' यानी खरीदने और बेचने की कीमत के अंतर पर ध्यान देना होगा। अगर किसी ETF का वॉल्यूम कम है, तो यह अंतर ज्यादा होगा, जिससे आपको खरीदते समय ज्यादा दाम चुकाना पड़ेगा और बेचते समय कम रिटर्न मिलेगा। खासकर कमोडिटी या इंटरनेशनल फंड्स में निवेश से पहले एक्सचेंज पर वॉल्यूम जरूर देखें।
रिस्क मैनेजमेंट
ग्लोबल ETFs में 'करेंसी रिस्क' भी होता है। अगर रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत होता है, तो आपके अंतरराष्ट्रीय निवेश का रिटर्न कम हो सकता है। इसके अलावा, कमोडिटी ETFs साइक्लिक होते हैं और इनमें मुनाफा कमाने के लिए लंबी अवधि का नज़रिया रखना ही समझदारी है।
