भारतीय म्यूचुअल फंड हाउस इस साल **79%** IPO में हिस्सा ले रहे हैं, लेकिन प्रति डील उनका औसत निवेश **₹412 करोड़** तक घट गया है, जो **2025** में **₹749 करोड़** था। SIP में हर महीने **₹31,000 करोड़** से ज्यादा का निवेश आने के बावजूद फंड मैनेजर अब रिस्क कम करने के लिए सिलेक्टिव अप्रोच अपना रहे हैं।
भारतीय म्यूचुअल फंड हाउस 2026 में प्राइमरी मार्केट को लेकर अपनी रणनीति बदल रहे हैं। हालांकि, नई लिस्टिंग में उनकी उपस्थिति अभी भी बनी हुई है और वे 79% IPO में शामिल हो रहे हैं, लेकिन प्रति डील उनका वित्तीय कमिटमेंट काफी सतर्क हो गया है। डेटा बताता है कि IPO में औसत निवेश गिरकर ₹412 करोड़ रह गया है, जो कि 2025 के ₹749 करोड़ के औसत से काफी कम है। यह साफ दर्शाता है कि फंड मैनेजर अब हर लिस्टिंग में बड़ी रकम लगाने के बजाय सावधानी बरत रहे हैं।
पैसा बहुत है, पर सावधानी जरूरी
निवेश कम करने का मतलब यह नहीं है कि फंड हाउस के पास नकदी की कमी है। म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री के पास 2026 में हर महीने ₹31,000 करोड़ से ज्यादा का SIP इनफ्लो आ रहा है। असल में, यह बदलाव IPO मार्केट के बदलते मिजाज का नतीजा है। IPO का औसत आकार भी पिछले साल के ₹1,682 करोड़ से घटकर करीब ₹1,160 करोड़ रह गया है। फंड मैनेजर जानबूझकर एक ही कंपनी में अपना एक्सपोजर सीमित कर रहे हैं ताकि रिस्क को मैनेज किया जा सके।
संस्थागत भागीदारी और बाजार की स्थिति
प्राइमरी मार्केट में अब सिर्फ म्यूचुअल फंड ही नहीं, बल्कि ऑल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (AIF), इंश्योरेंस कंपनियां और फैमिली ऑफिस भी बड़े खिलाड़ी बनकर उभरे हैं। जुलाई 2026 तक म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री का कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) ₹85.76 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। इतनी बड़ी संख्या में निवेशकों के आने से कई बार लोकप्रिय IPO में जबरदस्त ओवरसब्सक्रिप्शन देखने को मिलता है, जो कंपनी के वैल्युएशन से जुड़ी चिंताओं को ढक सकता है।
निवेशकों के लिए नजरिया
मौजूदा ट्रेंड निवेशकों को लिस्टिंग गेन्स और लॉन्ग टर्म बिजनेस वैल्यू के बीच फर्क समझने की सीख दे रहा है। इस साल लिस्टिंग के दिन औसतन 12.9% का रिटर्न मिला है, लेकिन 30 दिन के लॉक-इन के बाद परफॉर्मेंस 7.9% पर सिमट गई। वहीं, 90 दिन के नजरिए से देखें तो रिटर्न 24.8% रहा है। यह गैप बताता है कि मार्केट अब जल्दबाजी के बजाय धैर्य रखने वालों को फायदा दे रहा है।
