31 अगस्त, 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, इक्विटी म्यूचुअल फंड्स ने औसतन **14.5%** का CAGR रिटर्न दिया है, जबकि PMS (Portfolio Management Services) का औसत रिटर्न **14%** रहा है। म्यूचुअल फंड्स में बेहतर टैक्स एफिशिएंसी और रिस्क मैनेजमेंट इसे निवेशकों के लिए ज्यादा सुरक्षित विकल्प बनाता है।
पिछले एक दशक से भारतीय निवेशकों के बीच यह बहस छिड़ी है कि प्रीमियम पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) बेहतर है या स्टैंडर्ड इक्विटी म्यूचुअल फंड्स। 31 अगस्त, 2026 तक के डेटा से यह साफ हो गया है कि म्यूचुअल फंड्स ने बाजी मार ली है।
म्यूचुअल फंड्स क्यों हैं बेहतर?
इस प्रदर्शन के पीछे मुख्य कारण टैक्स और रिस्क मैनेजमेंट है। म्यूचुअल फंड्स कड़े रेगुलेशंस के तहत काम करते हैं, जिससे पोर्टफोलियो में अनिवार्य डायवर्सिफिकेशन होता है। इससे निवेशक किसी एक स्टॉक के गिरने के बड़े जोखिम से बच जाते हैं। इसके विपरीत, PMS अक्सर कुछ चुनिंदा स्टॉक्स पर दांव लगाते हैं। हालांकि सही रहने पर यह काफी मुनाफा दे सकता है, लेकिन गलत होने पर बड़ा नुकसान भी झेलना पड़ता है। पिछले 10 वर्षों में 12% PMS स्कीम्स का रिटर्न 10% से कम रहा, जबकि म्यूचुअल फंड्स में यह आंकड़ा मात्र 1% था।
टैक्स के मामले में भी म्यूचुअल फंड्स आगे हैं। म्यूचुअल फंड में फंड मैनेजर जब शेयर्स खरीदता या बेचता है, तो निवेशक को तुरंत टैक्स नहीं देना पड़ता। लेकिन PMS में पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग के दौरान हर बार कैपिटल गेन्स टैक्स लग जाता है, जो लंबे समय में मुनाफे को कम कर देता है।
PMS कब चुनें?
भले ही म्यूचुअल फंड्स का औसत प्रदर्शन बेहतर है, लेकिन कुछ खास निवेशकों के लिए PMS अभी भी उपयोगी है। डेटा के अनुसार, 4% PMS स्कीम्स ने 20% से ज्यादा का सालाना रिटर्न दिया है, जबकि म्यूचुअल फंड्स में यह संख्या केवल 1% है। यदि आपकी रिस्क लेने की क्षमता अधिक है और आप शानदार परफॉर्मेंस की तलाश में हैं, तो ही PMS पर विचार करना चाहिए। सामान्य निवेशकों के लिए, जो कम लागत और निरंतरता चाहते हैं, म्यूचुअल फंड्स आज भी पहली पसंद बने हुए हैं।
