अक्टूबर 2026 के म्यूचुअल फंड परफॉरमेंस आंकड़े जारी कर दिए गए हैं, जिसमें NAV, एक्सपेंस रेश्यो और CAGR जैसे प्रमुख मेट्रिक्स शामिल हैं। निवेशक अब इनके जरिए अपने पोर्टफोलियो की दक्षता और जोखिम को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
अक्टूबर 2026 तक के म्यूचुअल फंड परफॉरमेंस का नया डेटा अब निवेशकों के लिए उपलब्ध है। यह जानकारी इक्विटी, पैसिव, डेट और हाइब्रिड स्कीमों के अलग-अलग मार्केट साइकिल में प्रदर्शन को समझने में मदद करती है। निवेशक नेट एसेट वैल्यू (NAV), कॉर्पस साइज और एक्सपेंस रेश्यो की तुलना करके अपने पोर्टफोलियो की कुशलता का आकलन कर सकते हैं।
परफॉरमेंस मेट्रिक्स को समझना
स्टार रेटिंग्स केवल शुरुआत है। एक गहरे विश्लेषण के लिए रेगुलर और डायरेक्ट प्लान के एक्सपेंस रेश्यो की तुलना करना बेहद जरूरी है, क्योंकि अधिक एक्सपेंस रेश्यो का मतलब है कि आपके निवेश का बड़ा हिस्सा एडमिनिस्ट्रेटिव खर्चों में जा रहा है। इसके अलावा, 1, 3, 5 और 10 साल की अवधि के लिए कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) का विश्लेषण करने से शॉर्ट-टर्म मार्केट शोर को फिल्टर करने में मदद मिलती है।
अब फंड्स को रिस्क-एडजस्टेड मेट्रिक्स से भी परखा जा रहा है। Sortino Ratio यह समझने में मदद करता है कि खराब बाजार के दिनों में फंड कितना गिरता है। वहीं, पैसिव फंड्स के लिए 'ट्रैकिंग एरर' देखना अनिवार्य है। यदि ट्रैकिंग एरर ज्यादा है, तो इसका मतलब है कि फंड अपने बेंचमार्क इंडेक्स को ठीक से फॉलो नहीं कर पा रहा है।
सेक्टर ट्रेंड्स और जोखिम
डेटा से पता चलता है कि PSU इक्विटी जैसे थिएमैटिक फंड्स ने 5 साल में 20% से ज्यादा का CAGR दिया है। हालांकि, निवेशकों को सावधान रहना चाहिए क्योंकि ऐसे रिटर्न अक्सर अस्थायी मार्केट साइकिल का हिस्सा होते हैं।
डेट फंड्स की बात करें तो ये RBI की ब्याज दरों के बदलावों के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं। निवेश से पहले यह जरूर देखें कि फंड किन बॉन्ड्स में पैसा लगा रहा है। AA या उससे कम रेटिंग वाले बॉन्ड्स में डिफॉल्ट का जोखिम हो सकता है। साथ ही, SEBI के फरवरी 2026 के सर्कुलर का भी फंड्स की बनावट पर असर पड़ा है, इसलिए पुरानी रेटिंग्स पर आंख मूंदकर भरोसा न करें।
