भारत के दिग्गज म्यूचुअल फंड एक्सपर्ट्स ने सरकार से डेट फंड्स पर टैक्स नियमों को आसान बनाने की अपील की है। उनका मानना है कि मौजूदा टैक्स स्ट्रक्चर के कारण ये फंड्स बैंक डिपॉजिट्स के मुकाबले पिछड़ रहे हैं।
मनीकंट्रोल म्यूचुअल फंड समिट में दिग्गज फंड हाउसों ने डेट मार्केट में सुधार और निवेशकों की बचत को बढ़ावा देने के लिए सरकार के सामने अपनी मांगें रखी हैं। HDFC Asset Management Company, Kotak Mahindra Asset Management Company और Edelweiss Mutual Fund के टॉप लीडर्स ने साफ कहा कि मौजूदा टैक्स रेगुलेशंस डेट फंड्स के लिए बड़ी बाधा बन रहे हैं।
घटती हिस्सेदारी का संकट
इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2016 में डेट और लिक्विड फंड्स का एसेट बैंक डिपॉजिट्स के मुकाबले करीब 10% था, जो अब घटकर 6% से भी कम रह गया है। HDFC AMC के नवनीत मुनोत ने बताया कि इंडस्ट्री का ग्रोथ अब केवल इक्विटी-ओरिएंटेड प्रोडक्ट्स तक सीमित रह गया है, जिसके पीछे टैक्स का भेदभाव एक बड़ा कारण है।
टैक्स पैरिटी की मुख्य मांग
मौजूदा व्यवस्था में डेट म्यूचुअल फंड्स से होने वाले मुनाफे पर निवेशक के टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है, जबकि लिस्टेड डिबेंचर्स पर एक तय अवधि के बाद केवल 12.5% का कैपिटल गेन्स टैक्स लगता है। कोटक महिंद्रा AMC के नीलेश शाह का तर्क है कि अगर यह टैक्स गैप कम किया जाए, तो डेट फंड्स अन्य फिक्स्ड-इनकम इंस्ट्रूमेंट्स को कड़ी टक्कर दे सकेंगे।
मार्केट की अन्य चुनौतियां
नीलेश शाह ने कहा कि मार्केट में इंटरेस्ट-रेट डेरिवेटिव्स की कमी और क्रेडिट डिफॉल्ट स्वैप्स (CDS) में कम एक्टिविटी के कारण फंड मैनेजर्स के लिए पोर्टफोलियो को हेज (Hedge) करना मुश्किल हो गया है। वहीं, एडलवाइज म्यूचुअल फंड की राधिका गुप्ता ने कहा कि कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट में और गहराई लाने की जरूरत है। उन्होंने REITs और InvITs जैसे फ्लेक्सिबल प्रोडक्ट्स पर भी जोर दिया, जो लॉन्ग-टर्म इंफ्रास्ट्रक्चर फंडिंग के लिए बेहतर विकल्प बन सकते हैं।
सावधानी: फिलहाल ये सिर्फ इंडस्ट्री के सुझाव हैं। सरकार की ओर से अभी तक टैक्स नियमों में बदलाव को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, इसलिए निवेशकों को SEBI या बजट अपडेट्स पर नजर रखनी चाहिए।
