स्ट्रक्चरल डायवर्सिफिकेशन की ओर बड़ा कदम
मल्टी-कैप फंड में निवेश बढ़ने की एक बड़ी वजह है बाज़ार की अस्थिरता से बचाव की कोशिश। निवेशक अब किसी एक सेक्टर या स्टॉक पर दांव लगाने के बजाय ऐसी योजनाओं में पैसा लगा रहे हैं, जिनमें लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप शेयरों का एक निश्चित हिस्सा रखना ज़रूरी होता है। यह स्ट्रक्चरल नियम फंड मैनेजरों को तब मदद करता है जब किसी खास मार्केट कैप का सेगमेंट बहुत महंगा हो जाता है या उसमें लिक्विडिटी कम हो जाती है।
वैल्यूएशन का जोखिम और रिटर्न का सच
Nippon India Multicap जैसे बड़े फंडों ने पिछले 5 सालों में 21% का शानदार रिटर्न दिया है, लेकिन यह रिटर्न काफी हद तक पिछले 3 सालों में मिड और स्मॉल-कैप सेगमेंट में आई ज़बरदस्त तेजी की वजह से है। Nifty Midcap 100 इंडेक्स, Nifty 50 की तुलना में काफी महंगा हो गया है। ऐसे में, डबल-डिजिट रिटर्न की सस्टेनेबिलिटी पर सवाल उठते हैं। यह समझें कि हालिया प्रदर्शन शेयरों में हाई बीटा एक्सपोजर (High Beta Exposure) का नतीजा है। अगर ग्लोबल ब्याज दरें ऊंची बनी रहती हैं और डोमेस्टिक लिक्विडिटी टाइट होती है, तो मिड-कैप पर निर्भरता एक बोझ बन सकती है, खासकर अगर वैल्यूएशन मल्टीपल्स में बड़ी गिरावट आती है।
जानकारों की चिंताएं
मल्टी-कैप फंड में इनफ्लो के इस उत्साह के पीछे रेगुलेटरी कंप्लायंस (Regulatory Compliance) और फंड कॉन्सेंट्रेशन (Fund Concentration) के छिपे हुए जोखिमों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। SEBI के नए नियमों के तहत, मल्टी-कैप फंडों को लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप में कम से कम 25% का निवेश रखना अनिवार्य है। ऐसे में, अगर बाज़ार में बड़ी गिरावट आती है, तो फंड मैनेजर पूरी तरह से डिफेंसिव लार्ज-कैप या कैश पोजीशन में नहीं जा सकते, क्योंकि यह उनके इन्वेस्टमेंट चार्टर का उल्लंघन होगा। इसके अलावा, इस कैटेगरी में कुल एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) ₹2.28 लाख करोड़ से ज़्यादा हो चुका है। ऐसे में, फंड मैनेजरों के लिए स्मॉल-कैप सेगमेंट में कुशलतापूर्वक पैसा लगाना और स्टॉक्स की कीमतें बढ़ाए बिना निवेश करना मुश्किल होता जा रहा है। इससे भविष्य में रिटर्न कम हो सकता है और रिडेम्पशन (Redemption) के समय लिक्विडिटी की समस्या आ सकती है।
आगे की राह और सेक्टर का प्रभाव
भविष्य में इनफ्लो का जारी रहना Nifty Midcap और Smallcap इंडेक्स के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा डोमेस्टिक ब्लू-चिप्स पर दबाव के बीच, घरेलू खुदरा निवेशकों की मल्टी-कैप फंडों में दिलचस्पी एक अहम सहारा बनी हुई है। एनालिस्ट्स (Analysts) इन फंडों द्वारा होल्ड की गई कंपनियों के मार्जिन पर दबाव को लेकर सतर्क हैं, खासकर मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) और कंज्यूमर डिस्क्रिशनरी (Consumer Discretionary) सेक्टरों में, जहां इनपुट कॉस्ट इन्फ्लेशन (Input Cost Inflation) का दबाव बना हुआ है। भले ही डायवर्सिफिकेशन के फायदे स्पष्ट हैं, लेकिन मौजूदा इनफ्लो यह संकेत देता है कि खुदरा बाज़ार भारतीय इक्विटी मार्केट के मिड-टियर सेगमेंट्स में वैल्यूएशन रीवर्जन (Valuation Reversion) की संभावना को कम आंक रहा है।
