SEBI के नियमों के मुताबिक मल्टी-एसेट फंड्स को कम से कम तीन एसेट क्लास में पैसा लगाना होता है, लेकिन पोर्टफोलियो मिक्स के आधार पर इनका रिस्क लेवल पूरी तरह बदल जाता है।
मल्टी-एसेट एलोकेशन म्यूचुअल फंड्स का रेगुलेटरी लक्ष्य एक ही होता है, लेकिन इनके काम करने का तरीका बिल्कुल अलग है। SEBI के दिशानिर्देशों के अनुसार, इन फंड्स को कम से कम तीन एसेट क्लासेस में निवेश करना होता है, जिसमें हर क्लास में कम से कम 10% का एलोकेशन जरूरी है। इसके बाद फंड मैनेजर्स को यह छूट होती है कि वे बाकी रकम को कैसे निवेश करें। यही कारण है कि एक ही कैटेगरी के दो फंड्स का बर्ताव बाजार में अलग-अलग हो सकता है।\n\n### इक्विटी-हेवी बनाम डिफेंसिव स्ट्रेटजी\n\nकुछ फंड्स एग्रेसिव होते हैं और सीधे स्टॉक मार्केट पर दांव लगाते हैं। Quant Multi Asset Allocation Fund और Bandhan Multi Asset Allocation Fund जैसे फंड्स ने अपने पोर्टफोलियो का 60% से ज्यादा हिस्सा इक्विटी में रखा है। रिस्क को कम करने के लिए ये फंड मैनेजर अक्सर 'इक्विटी-फ्यूचर्स हेज' का इस्तेमाल करते हैं।\n\nवही दूसरी तरफ, 360 ONE Multi Asset Allocation Fund जैसे फंड्स गोल्ड और सिल्वर जैसे अल्टरनेटिव एसेट्स पर जोर देते हैं ताकि बाजार की उठापटक को झेला जा सके। इसी तरह, WhiteOak Capital का झुकाव REITs और InvITs की तरफ अधिक रहता है।\n\n### स्टेबिलिटी के लिए डेट का इस्तेमाल\n\nजो निवेशक कम रिस्क लेना चाहते हैं, उनके लिए Edelweiss Multi Asset Allocation Fund एक उदाहरण है। यह फंड अपने पोर्टफोलियो का 50% से ज्यादा हिस्सा कॉर्पोरेट बॉन्ड्स जैसे डेट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करता है, जबकि इक्विटी एक्सपोजर को 25% के आसपास सीमित रखता है।\n\n### निवेशकों को क्या देखना चाहिए?\n\nकेवल पिछले रिटर्न को देखकर फैसला लेना गलत हो सकता है। अगर बाजार में बड़ी गिरावट आती है, तो इक्विटी-हेवी फंड्स का रिस्क बहुत ज्यादा होता है। सही चुनाव के लिए हर महीने फंड हाउस की वेबसाइट पर जाकर 'मंथली फैक्ट शीट' चेक करना जरूरी है। इसमें साफ होता है कि पैसा स्टॉक, गोल्ड, या डेट में कितना लगा है, जिससे आप यह समझ सकते हैं कि क्या वह फंड आपके फाइनेंशियल गोल्स के हिसाब से सही है या नहीं।
