कमोडिटी की गिरीं कीमतें, मल्टी-एसेट फंड्स बने कवच!
जनवरी 2026 की शुरुआत में कमोडिटी मार्केट में जबरदस्त हलचल देखी गई। चांदी की कीमतों में एक ही दिन में करीब 25% की भारी गिरावट आई, तो वहीं सोने में भी हाल के दिनों में लगभग 10% की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। इस तूफानी माहौल में, मल्टी-एसेट एलोकेशन फंड्स ने निवेशकों के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच का काम किया। इन्होंने सेक्टर-स्पेसिफिक झटकों को झेलने और प्योर इक्विटी फंड्स को पीछे छोड़ने की अपनी क्षमता साबित की। उदाहरण के तौर पर, Nippon India Multi-Asset Allocation Fund ने पिछले एक साल में 21.21% और तीन साल में 22.26% का शानदार रिटर्न दिया है, जो कि कैटेगरी के औसत 16.39% और 17.15% से काफी आगे है। इन फंड्स की खासियत यह है कि ये कम से कम तीन एसेट क्लास (जैसे इक्विटी, डेट और कमोडिटी) में निवेश करते हैं, जिससे किसी एक एसेट क्लास में बड़ी गिरावट का असर पोर्टफोलियो पर कम पड़ता है।
डाइवर्सिफिकेशन का कमाल: क्यों रहे मल्टी-एसेट फंड्स आगे?
फरवरी 2026 की शुरुआत के आंकड़ों के मुताबिक, टॉप 10 मल्टी-एसेट एलोकेशन फंड्स ने पिछले एक साल में औसतन 20% का रिटर्न दिया है, जो टॉप इक्विटी फंड्स के 17% रिटर्न से कहीं बेहतर है। यह बेहतर परफॉरमेंस इन फंड्स के डाइवर्सिफाइड नेचर (विविधीकरण) का नतीजा है, जो किसी एक जगह पैसा लगाने के रिस्क को कम करता है। Nippon India Multi-Asset Allocation Fund, जिसका एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) दिसंबर 2025 तक करीब ₹12,513 करोड़ था, इस स्ट्रैटेजी से काफी फायदे में रहा। फंड के एसेट एलोकेशन में इक्विटी का हिस्सा करीब 59.53%, डेट का 17.55% है, और साथ ही गोल्ड व सिल्वर ईटीएफ (ETFs) भी शामिल हैं जो एक हेज (hedge) का काम करते हैं। यह संतुलित तरीका खास तौर पर तब अहम हो जाता है जब महंगाई, ब्याज दरें और भू-राजनीतिक तनाव जैसे मैक्रो-इकोनॉमिक फैक्टर्स ग्लोबल मार्केट्स को प्रभावित करते रहते हैं और कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव लाते हैं।
रिस्क फैक्टर: क्या वाकई सब कुछ सुरक्षित है?
मल्टी-एसेट फंड्स की इस मजबूती के बावजूद, इनमें महत्वपूर्ण जोखिम बने हुए हैं। 2025 और 2026 की शुरुआत में सोने और चांदी में देखी गई जबरदस्त तेजी हमेशा जारी नहीं रह सकती। अगर इन कीमती धातुओं की कीमतों में बड़ी गिरावट या लंबे समय तक नरमी आती है, तो इन फंड्स का रिटर्न बुरी तरह प्रभावित हो सकता है, और वे प्योर इक्विटी फंड्स से पीछे रह सकते हैं। इसके अलावा, जिन फंड्स का एक्सपोजर किसी खास कमोडिटी में बहुत ज्यादा है, जैसे कि 'फंड ऑफ फंड्स' जिनमें 50% तक सोना या चांदी में निवेश होता है, वे ऐसी तेज प्राइस स्विंग्स के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं। हालांकि, Nippon India Multi-Asset Allocation Fund के पोर्टफोलियो में गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ शामिल हैं, लेकिन इक्विटी और डेट में बड़े एलोकेशन के साथ, इनका वेटेज एक संतुलित रिस्क प्रोफाइल बनाए रखने में मददगार साबित हुआ। फिर भी, कुछ रेटिंग एजेंसियों ने मल्टी-एसेट फंड्स की कैटेगरी को 'वेरी हाई रिस्क' (Very High Risk) करार दिया है। ऐसे फंड्स, जिनमें इक्विटी का हिस्सा कम होता है, मजबूत इक्विटी मार्केट में पिछड़ सकते हैं। कमोडिटीज की अंदरूनी अस्थिरता, ग्लोबल मॉनेटरी पॉलिसी में बदलाव और जियोपॉलिटिकल अनिश्चितताओं के चलते, डाइवर्सिफाइड फंड्स भी बड़े डाउनसाइड रिस्क का सामना कर सकते हैं, अगर कमोडिटी की कीमतें गिरती हैं। डीएसपी म्यूचुअल फंड (DSP Mutual Fund) की अपर्णा कर्निग (Aparna Karnik) भी एक लॉन्ग-टर्म नजरिया रखने की सलाह देती हैं, यह मानते हुए कि कमोडिटी की वोलेटिलिटी (volatility) इन एसेट्स का हिस्सा है। लेकिन, रिस्क मैनेजमेंट की प्रभावशीलता पूरी तरह फंड की एसेट एलोकेशन स्ट्रैटेजी और फंड मैनेजर की इन जटिल मार्केट डायनामिक्स को संभालने की क्षमता पर निर्भर करती है। सर्च रिजल्ट्स में Nippon India Mutual Fund के खिलाफ किसी खास रेगुलेटरी कार्रवाई का कोई उल्लेख नहीं मिला।
भविष्य का नज़रिया: क्या है आगे की राह?
विश्लेषकों का मानना है कि 2026 में भी मल्टी-एसेट एलोकेशन फंड्स निवेशकों का ध्यान आकर्षित करते रहेंगे, खासकर मौजूदा भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और आर्थिक अस्थिरता को देखते हुए। हालांकि कमोडिटी की कीमतों में शॉर्ट-टर्म गिरावट एक आम बात है, लेकिन इन डाइवर्सिफाइड फंड्स का लॉन्ग-टर्म आकर्षण बना रहने की उम्मीद है, जो ग्रोथ पोटेंशियल और रिस्क कम करने का मिश्रण पेश करते हैं। निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे लॉन्ग-टर्म नजरिया अपनाएं और अपने वित्तीय लक्ष्यों और रिस्क टॉलरेंस के अनुरूप व्यक्तिगत फंड्स की खास एसेट एलोकेशन और रिस्क मैनेजमेंट स्ट्रैटेजी का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करें।