बाजार में जारी उठापटक के बीच, मल्टी-एसेट एलोकेशन फंड्स (Multi-Asset Allocation Funds) निवेशकों का ध्यान खींच रहे हैं। पिछले छह महीनों में सेंसेक्स और निफ्टी में आई बड़ी गिरावट के बाद, ये हाइब्रिड फंड्स निवेशकों के लिए जोखिम कम करने और बेहतर रिटर्न पाने का एक ज़रिया बन गए हैं।
बाजार में अस्थिरता से निपटने का नया तरीका
पिछले छह महीनों में भारतीय शेयर बाजार ने बड़ी उथल-पुथल देखी है। इस दौरान, सेंसेक्स (Sensex) में करीब 11% और निफ्टी (Nifty) में 8.6% की गिरावट दर्ज की गई। यही नहीं, सोने (Gold) के दाम भी लगभग 20% गिरे हैं, जबकि चांदी (Silver) में तो 43% तक की भारी गिरावट आई है। ऐसे मुश्किल हालात में, निवेशक अब मल्टी-एसेट एलोकेशन फंड्स की ओर रुख कर रहे हैं, जो इन झटकों से निपटने में मदद कर सकते हैं।
मल्टी-एसेट फंड्स कैसे काम करते हैं?
ये फंड्स पारंपरिक इक्विटी (Equity) या डेट (Debt) फंड्स से अलग होते हैं। सेबी (SEBI) के नियमों के मुताबिक, इन फंड्स को कम से कम तीन अलग-अलग एसेट क्लास में निवेश करना होता है, और हर क्लास में कम से कम 10% का आवंटन जरूरी है। आमतौर पर, इनमें ग्रोथ के लिए इक्विटी, स्थिरता के लिए डेट इंस्ट्रूमेंट्स और अनिश्चितता के समय बचाव के लिए सोना (Commodities) शामिल होता है। इस मिश्रण से किसी एक एसेट क्लास पर निर्भरता कम हो जाती है और जोखिम बंट जाता है।
जोखिम प्रबंधन का राज
इन फंड्स की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अलग-अलग एसेट क्लास के बीच का कोरिलेशन (Correlation) कम होता है। यानी, जब शेयर बाजार गिरता है, तो हो सकता है कि डेट या सोना स्थिर रहें या उनकी चाल अलग हो। इस वजह से, पोर्टफोलियो के एक हिस्से में होने वाले नुकसान की भरपाई दूसरे हिस्से से हो सकती है। यह रणनीति बाजार में बड़ी गिरावट के समय नुकसान को सीमित करने में मदद करती है, लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि ऐसे फंड्स तेजी के दौर में शुद्ध इक्विटी फंड्स की तरह आक्रामक रिटर्न नहीं दे पाते हैं।
निवेशकों के लिए ध्यान रखने योग्य बातें
हाइब्रिड फंड्स में निवेश करने से पहले, निवेशकों को कुछ बातों पर गौर करना चाहिए। सबसे अहम है फंड मैनेजर की पोर्टफोलियो को रीबैलेंस (Rebalance) करने की क्षमता। बाजार के हालात के हिसाब से एसेट आवंटन बदलना फंड के प्रदर्शन को बहुत प्रभावित करता है। इसके अलावा, टैक्स (Tax) के नियमों को समझना भी जरूरी है, क्योंकि फंड में मौजूद एसेट मिक्स के आधार पर यह शुद्ध इक्विटी म्यूचुअल फंड्स से अलग हो सकता है। आमतौर पर, ऐसे फंड्स के लिए 3 से 5 साल का लंबी अवधि का नजरिया रखने की सलाह दी जाती है, ताकि एसेट डाइवर्सिफिकेशन (Asset Diversification) का पूरा फायदा मिल सके।
