अगस्त 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय निवेशकों ने मल्टी-एसेट एलोकेशन फंड्स में **₹68,519 करोड़** का निवेश किया है। इसने स्मॉल-कैप और मिड-कैप फंड्स को पीछे छोड़ दिया है, जो सुरक्षित रिटर्न के प्रति निवेशकों के बढ़ते रुझान को दर्शाता है।
भारतीय म्यूचुअल फंड बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अगस्त 2026 को समाप्त हुए 12 महीनों में निवेशकों ने स्मॉल-कैप और मिड-कैप जैसे शुद्ध इक्विटी स्कीम्स के बजाय मल्टी-एसेट एलोकेशन फंड्स को अधिक प्राथमिकता दी है। इस दौरान मल्टी-एसेट स्कीम्स में ₹68,519 करोड़ का नेट इनफ्लो दर्ज किया गया, जबकि स्मॉल-कैप फंड्स में ₹62,331 करोड़ और मिड-कैप फंड्स में ₹61,016 करोड़ का निवेश आया। केवल फ्लेक्सी-कैप फंड्स ही ₹89,087 करोड़ के साथ इससे आगे रहे, जो यह साबित करता है कि हाइब्रिड प्रोडक्ट्स जोखिम प्रबंधन के लिए पहली पसंद बनते जा रहे हैं।
बैलेंस पोर्टफोलियो की ओर बढ़ा झुकाव
मल्टी-एसेट एलोकेशन फंड्स विविधता (Diversification) का एक बेहतरीन जरिया हैं। रेगुलेटरी नियमों के तहत, इन फंड्स को कम से कम तीन एसेट क्लास - इक्विटी, डेट और गोल्ड - में न्यूनतम 10% एक्सपोजर रखना अनिवार्य है। इससे बाजार में होने वाली उठा-पटक का असर कम हो जाता है। जब एक एसेट क्लास कमजोर होता है, तो बाकी के एसेट्स स्थिरता प्रदान करते हैं, जो निवेशकों के सफर को स्मूथ बनाते हैं।
क्यों हर मल्टी-एसेट फंड अलग है?
नाम एक होने के बावजूद इनकी रणनीति अलग हो सकती है। फंड मैनेजरों के पास एसेट एलोकेशन की पूरी आजादी होती है। अगस्त 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, टॉप स्कीम्स में इक्विटी एक्सपोजर 24.7% से लेकर 73.92% तक रहा है। यह अंतर काफी बड़ा है, क्योंकि अधिक इक्विटी वाले फंड बाजार के उतार-चढ़ाव के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
प्रदर्शन में अंतर और निवेशकों के लिए सलाह
मानकीकृत (Standardized) एसेट मिक्स न होने के कारण रिटर्न्स में भारी अंतर दिखता है। कुछ फंड्स ने 15.85% तक का सालाना रिटर्न दिया है, जबकि अन्य के नतीजे काफी अलग हैं। निवेशकों को सलाह है कि वे केवल फंड के नाम पर न जाएं, बल्कि फंड के ऐतिहासिक रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न और मौजूदा एसेट एलोकेशन को जरूर चेक करें।
