हालिया डेटा बताता है कि केवल **21%** टॉप-परफॉर्मिंग इक्विटी म्यूचुअल फंड ही **5 साल** की अवधि में अपनी बादशाहत बरकरार रख पाते हैं। सिर्फ पिछले रिटर्न को देखकर फंड चुनना निवेशकों के लिए बड़ा जोखिम बन सकता है।
ज्यादातर निवेशक उन म्यूचुअल फंड्स की ओर आकर्षित होते हैं जो परफॉर्मेंस चार्ट में सबसे ऊपर दिखते हैं। यह सोचना स्वाभाविक है कि जिसने पिछले एक-दो साल में सबसे ज्यादा रिटर्न दिया, वह आगे भी ऐसा ही करेगा। लेकिन, फाइनेंशियल डेटा कुछ और ही कहानी बयां करता है। आंकड़ों के मुताबिक, जो फंड 5 साल की अवधि में टॉप 25% की सूची में थे, उनमें से केवल 21% ही अगले 5 साल तक अपना स्थान बचा पाए। अगर 3 साल के विंडो को देखें, तो यह आंकड़ा लगभग 26% के आसपास रहता है।\n\n### पुरानी रैंकिंग भ्रामक क्यों?
\nइसका मुख्य कारण शेयर बाजार का साइक्लिक नेचर है। हर फंड की अपनी एक स्ट्रैटेजी होती है, जैसे लार्ज-कैप, मिड-कैप या स्मॉल-कैप। बाजार का नेतृत्व हमेशा एक ही जगह नहीं रहता। जो फंड स्मॉल-कैप रैली में शानदार रिटर्न देता है, वह बाजार का मूड बदलने पर पिछड़ सकता है। यह फंड मैनेजर की कमी नहीं, बल्कि बदलती आर्थिक परिस्थितियों का नतीजा है।\n\nमिसाल के तौर पर, 2004 से 2008 के बीच जो फंड लीडर थे, उनमें से बहुत कम ही अपनी रैंकिंग अगले दौर में बरकरार रख पाए। यहां तक कि 2014 से 2018 के बीच के लीडर्स में से आधे से भी कम 2023 तक अपनी चमक बनाए रख सके। जब बैंकिंग, टेक्नोलॉजी या एनर्जी जैसे सेक्टर बदलते हैं, तो फंड की रैंकिंग अपने आप ऊपर-नीचे होती रहती है।\n\n### रिटर्न से ज्यादा क्या है जरूरी?\n\nरैंकिंग अस्थाई होती है, इसलिए सिर्फ रिटर्न के प्रतिशत को पैमाना मानना गलत निर्णय हो सकता है। निवेशक अक्सर तब पैसा लगाते हैं जब फंड अपने चक्र के शिखर पर होता है और ठीक उसके बाद गिरावट का दौर शुरू हो जाता है।\n\nनिवेशकों को 'कंसिस्टेंसी' (Consistency) पर ध्यान देना चाहिए। यह देखें कि फंड अपने बेंचमार्क के मुकाबले हर बाजार चक्र में कैसा प्रदर्शन कर रहा है। एक ऐसा फंड जो हर तरह के बाजार में स्थिर रिटर्न दे, वह उस फंड से बेहतर है जो एक साल में आसमान छुए और दूसरे साल बड़ी गिरावट दर्ज करे। फंड का चयन करते समय 'डाउनसाइड प्रोटेक्शन' (Downside Protection) यानी बाजार गिरने पर फंड कितना संभलता है, यह देखना लॉन्ग-टर्म वेल्थ क्रिएशन के लिए ज्यादा फायदेमंद है।
