नवीनतम AMFI डेटा के अनुसार, भारतीय म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में सक्रिय फंड मैनेजर्स के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। जुलाई 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, ज्यादातर लार्ज-कैप और मिड-कैप फंड्स अपने बेंचमार्क इंडेक्स से पिछड़ गए हैं।
सेग्मेंट परफॉर्मेंस में बड़ा अंतर
डेटा बताता है कि लार्ज-कैप फंड्स को सबसे ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ा, जहां 71% फंड्स पांच साल में अपने बेंचमार्क को बीट नहीं कर पाए। मिड-कैप फंड्स की हालत और भी खराब रही, जहाँ 76% फंड्स पिछड़ गए। वहीं, स्मॉल-कैप सेगमेंट में स्थिति थोड़ी बेहतर दिखी, जहाँ 43% फंड्स अपने बेंचमार्क से पीछे रहे। इससे यह पता चलता है कि स्मॉल-कैप कंपनियों में एक्टिव स्टॉक पिकिंग ज़्यादा कारगर साबित हो सकती है, जहाँ रिसर्च के दम पर बेहतर रिटर्न (Alpha) हासिल करना आसान होता है।
एक्सपेंस रेश्यो का असर
इस ट्रेंड का एक मुख्य कारण एक्टिव और पैसिव इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट्स के बीच लागत का अंतर है। एक्टिव लार्ज-कैप फंड्स के रेगुलर प्लान्स के लिए औसतन 1.73% और डायरेक्ट प्लान्स के लिए 0.73% एक्सपेंस रेश्यो है। इसके मुकाबले, निफ्टी 50 या निफ्टी 100 को ट्रैक करने वाले इंडेक्स फंड्स में काफी कम शुल्क लगता है, जो औसतन 0.46% और 0.18% है। निफ्टी 50 एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETFs) सबसे किफायती विकल्प हैं, जिनका औसत 0.06% है। ये लागत फंड की संपत्ति से काटी जाती है, जिसका मतलब है कि एक्टिव मैनेजर्स को फीस के बाद भी इंडेक्स फंड के बराबर रिटर्न देने के लिए काफी ज़्यादा मुनाफा कमाना पड़ता है।
ग्लोबल तुलना में भारतीय फंड्स
इन घरेलू चुनौतियों के बावजूद, अंतरराष्ट्रीय फंड्स की तुलना में भारतीय एक्टिव फंड्स का प्रदर्शन आम तौर पर बेहतर रहा है। एक, तीन, पांच और दस साल की अवधि में भारतीय एक्टिव फंड्स के अंडरपरफॉर्मेंस की दरें ग्लोबल औसत से कम हैं। खास तौर पर, भारत की दस साल की अंडरपरफॉर्मेंस दर दुनिया में सबसे कम दरों में से एक है। यह दर्शाता है कि भारत में एक्टिव मैनेजमेंट, अमेरिका या यूके जैसे विकसित बाजारों की तुलना में ज़्यादा प्रतिस्पर्धी परिणाम दे सकता है, जहाँ इंडेक्स-आधारित निवेश प्रमुख रणनीति बन गया है।
निवेशकों के लिए ज़रूरी बातें
यह डेटा बताता है कि जो निवेशक लार्ज-कैप एक्सपोजर चाहते हैं, उनके लिए कम लागत वाले पैसिव इंडेक्स फंड्स अक्सर ज़्यादा भरोसेमंद नतीजे दे सकते हैं। हालांकि, मिड-कैप और स्मॉल-कैप स्ट्रेटेजीज़ में एक्टिव मैनेजमेंट की भूमिका बनी रह सकती है, जहाँ उन स्टॉक्स को चुनने की क्षमता जो इंडेक्स से बेहतर प्रदर्शन करते हैं, एक महत्वपूर्ण अंतर पैदा करती है। निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो के एक्सपेंस रेश्यो और लंबी अवधि के परफॉर्मेंस पर लगातार नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि लार्ज-कैप कैटेगरी में लागत नेट रिटर्न पर लगातार दबाव डालती है।
