मिड-कैप का बढ़ता दबदबा
पिछले 12 महीनों के दौरान (जनवरी 2026 तक), मिड-कैप फंड्स में ₹1,139 करोड़ का भारी इनफ्लो आया, जो कुल ₹94,043 करोड़ तक पहुंच गया। यह आंकड़ा स्मॉल-कैप फंड्स में निवेश हुए ₹92,904 करोड़ से साफ तौर पर ज्यादा है। इससे पता चलता है कि निवेशक अपना पैसा कहां लगा रहे हैं। मिड-कैप फंड्स की एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) में भी जोरदार उछाल आया है, जो दिसंबर 2022 के ₹1.85 लाख करोड़ से बढ़कर दिसंबर 2025 तक ₹4.61 लाख करोड़ हो गई है - यानी लगभग ढाई गुना से ज्यादा की बढ़ोतरी। इस तेजी की एक वजह यह भी है कि Nifty Midcap 150 इंडेक्स ने Nifty 100 और Nifty Smallcap 250 जैसे बड़े इंडेक्स को कई समयावधियों में पछाड़ दिया है। HDFC, Mahindra Manulife, Motilal Oswal और Kotak Mahindra जैसे कई प्रमुख फंड हाउसों के मिड-कैप फंड्स ने भी बेंचमार्क से बेहतर रिटर्न दिया है।
असली तस्वीर क्या कहती है?
लेकिन, इस बढ़ती लोकप्रियता के पीछे कुछ चिंताजनक संकेत भी छिपे हैं। फरवरी 2026 के मध्य तक, Nifty Midcap 150 इंडेक्स का प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेश्यो लगभग 32.82 के स्तर पर है। यह वैल्यूएशन 'फेयरली वैल्यूड' तो कहा जा रहा है, लेकिन यह अपने 1-साल और 3-साल के औसत P/E से ऊपर चल रहा है। इसकी तुलना में, Nifty Smallcap 250 इंडेक्स का P/E करीब 26.6 है, जो ज्यादा मामूली वैल्यूएशन दिखाता है। वहीं, बड़े यानी लार्ज-कैप शेयरों वाले Nifty 100 का P/E 22.1 के आसपास है, जो ज्यादा सुरक्षित वैल्यूएशन प्रस्तुत करता है।
हाल ही में 19 फरवरी 2026 को, Nifty Midcap 100 में 0.9% और Nifty Smallcap 100 में 0.5% की गिरावट देखी गई। यह दर्शाता है कि मिड-कैप और स्मॉल-कैप सेगमेंट भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं या प्रॉफिट-बुकिंग के चलते बिकवाली के प्रति काफी संवेदनशील हैं। फरवरी 2025 में भी, बाजार में गिरावट के दौरान Nifty Smallcap 100 में 13.07% और Nifty Midcap 100 में 10.8% की बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी। यह साफ करता है कि भले ही मिड-कैप, स्मॉल-कैप से कम अस्थिर (volatile) हों, लेकिन लार्ज-कैप की तुलना में इनमें रिस्क अभी भी ज्यादा है।
खतरे की घंटी (The Forensic Bear Case)
निवेशकों का इतना सारा पैसा मिड-कैप फंड्स में आने से AUM तो बढ़ रहा है, लेकिन यह शायद उन कंपनियों की कमाई (earnings) में बिना पर्याप्त इजाफे के उनकी वैल्यूएशन को फुला रहा है। कई रिपोर्ट्स यह इशारा कर रही हैं कि मिड-कैप इंडेक्स ऐतिहासिक औसत से प्रीमियम पर ट्रेड कर रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण 'न्यू-एज' ग्रोथ-ओरिएंटेड कंपनियां हैं, जिनकी कमाई अभी उतनी मजबूत नहीं है, लेकिन उनका वैल्यूएशन ज्यादा है। इसके अलावा, कॉरपोरेट गवर्नेंस (Corporate Governance) की चिंताएं, जो मिड और स्मॉल-कैप सेगमेंट में अक्सर देखने को मिलती हैं, अगर इन पर ध्यान न दिया गया तो निवेशकों को बड़ा नुकसान हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही मिड-कैप, स्मॉल-कैप की तुलना में बेहतर रिस्क-रिवॉर्ड प्रोफाइल पेश करते हों, लेकिन उनमें लार्ज-कैप से कहीं ज्यादा रिस्क और वोलेटिलिटी बनी रहती है। 19 फरवरी 2026 की बिकवाली ने इस बात को फिर से रेखांकित किया है।
आगे क्या? (Future Outlook)
भविष्य को देखते हुए, विश्लेषक मिड- और स्मॉल-कैप सेगमेंट को लेकर सतर्कता से आशावादी (cautiously optimistic) बने हुए हैं। वे अगले 3-4 महीनों में चुनिंदा शेयरों में ही निवेश (selective allocation) और धीरे-धीरे पैसे लगाने (phased investments) की सलाह दे रहे हैं। भारत की ग्रोथ स्टोरी के दम पर मिड-कैप फंड्स निवेशकों को आकर्षित करते रहेंगे, लेकिन अब फंड मैनेजर्स को स्टॉक चुनने और रिस्क मैनेजमेंट पर ज्यादा ध्यान देना होगा। कुछ अनुमानों के मुताबिक, 2026 में मिड-कैप्स बाजार को आउटपरफॉर्म कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए कंपनियों का चुनाव बहुत सोच-समझकर करना होगा। लार्ज-कैप्स शायद थोड़ा पीछे रह जाएं, जबकि स्मॉल-कैप्स का प्रदर्शन बाजार की चाल पर निर्भर करेगा। मिड-कैप की ग्रोथ की असल परीक्षा इस बात पर टिकी होगी कि कंपनियों की कमाई कितनी स्थिर रहती है, घरेलू निवेशक निवेश जारी रखते हैं या नहीं, और वे आने वाली मैक्रोइकॉनॉमिक चुनौतियों व भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं का सामना कैसे करते हैं।
