भारत में Specialised Investment Funds (SIFs) का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है। सितंबर 2026 तक इनका AUM बढ़कर **₹38,224 करोड़** हो गया है, जो निवेशकों के बीच डेरिवेटिव हेजिंग और एक्टिव एसेट एलोकेशन जैसी एडवांस स्ट्रेटेजी की बढ़ती डिमांड को दिखाता है।
बाजार में नया बदलाव
सितंबर 2026 के अंत तक SIFs का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) ₹38,224 करोड़ के स्तर पर पहुंच गया है। यह आंकड़ा पिछले महीने के ₹31,175 करोड़ से काफी ज्यादा है। यह सेगमेंट म्यूचुअल फंड और पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) के बीच के खाली स्थान को भरने का काम कर रहा है।
SEBI द्वारा 2025 में पेश किए गए ये फंड्स मैनेजरों को डेरिवेटिव्स के जरिए हेजिंग, शॉर्ट सेलिंग और एक्टिव एसेट एलोकेशन की आजादी देते हैं। इनमें निवेश की न्यूनतम सीमा ₹10 लाख (प्रति एसेट मैनेजमेंट कंपनी, पैन लेवल पर) तय की गई है, जो इसे रिटेल म्यूचुअल फंड्स से थोड़ा अलग और विशिष्ट बनाती है।
बाजार पर किसका दबदबा?
फिलहाल 17 एसेट मैनेजमेंट कंपनियां ये फंड्स ऑफर कर रही हैं, लेकिन बाजार में एकाधिकार (Concentration) साफ दिख रहा है। Edelweiss Mutual Fund, ICICI Prudential Mutual Fund और SBI Mutual Fund जैसे बड़े खिलाड़ी इंडस्ट्री का बड़ा हिस्सा संभाल रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, Edelweiss Mutual Fund का 'Altiva' प्लेटफॉर्म अकेले ₹13,221 करोड़ का एसेट मैनेज कर रहा है।
रिस्क को समझें (Risk Profile)
इन फंड्स में निवेश करने से पहले निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है। चूंकि ये फंड्स जटिल रणनीतियों (Complex Strategies) और डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल करते हैं, इसलिए इनका बर्ताव आम इक्विटी फंड्स जैसा नहीं होता।
लिक्विडिटी (Liquidity) के मामले में भी ये सामान्य म्यूचुअल फंड्स से अलग हैं। इनमें लॉक-इन पीरियड, नोटिस पीरियड या रिडेम्पशन विंडो जैसे नियम हो सकते हैं। साथ ही, डेरिवेटिव्स के इस्तेमाल से जुड़े ऑपरेशनल रिस्क, जैसे काउंटरपार्टी रिस्क, का भी ध्यान रखना जरूरी है। निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे फंड मैनेजर के ट्रैक रिकॉर्ड को परखें और निवेश से पहले लिक्विडिटी की शर्तों को ध्यान से पढ़ें।
