Multi-Asset Funds का कमाल: इक्विटी को पछाड़ा, निवेशकों को दी ज़बरदस्त सुरक्षा!

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AuthorAditya Rao|Published at:
Multi-Asset Funds का कमाल: इक्विटी को पछाड़ा, निवेशकों को दी ज़बरदस्त सुरक्षा!
Overview

Indian multi-asset funds ने पिछले साल औसतन **12%** का शानदार रिटर्न दिया है। इन्होंने इक्विटी, डेट और गोल्ड जैसे अलग-अलग एसेट क्लास में निवेश करके बढ़िया डाइवर्सिफिकेशन दिखाया, जिससे मार्केट के उतार-चढ़ाव से निवेशकों को सुरक्षा मिली।

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बाज़ार में उथल-पुथल के बीच मिली राहत

बाजार के अनिश्चित माहौल में Multi-Asset Funds ने अपनी खास रणनीति से निवेशकों को बड़ी राहत दी है। जहाँ प्योर इक्विटी फंड्स को नुकसान उठाना पड़ा, वहीं इन हाइब्रिड स्कीम्स ने अलग-अलग एसेट्स में निवेश कर स्टेबिलिटी और लगातार रिस्क-एडजस्टेड परफॉरमेंस दी। यह रणनीति निवेशकों की उस बढ़ती मांग को दर्शाती है जो वे अप्रत्याशित आर्थिक परिस्थितियों में स्थिरता चाहते हैं।

एसेट्स को मिलाकर कैसे मिली वोलेटिलिटी पर जीत?

SEBI के नियमों के अनुसार, इन फंड्स को कम से कम तीन एसेट क्लास में 10% का निवेश करना होता है। ये फंड्स आमतौर पर इक्विटी, डेट इंस्ट्रूमेंट्स और गोल्ड-सिल्वर जैसी कमोडिटी को मिलाकर पोर्टफोलियो बनाते हैं। पिछले साल की बात करें तो, जब ग्लोबल अनिश्चितता और सेंट्रल बैंक की बाइंग के चलते गोल्ड और सिल्वर की कीमतें बढ़ीं, तो इन फंड्स को काफी फायदा हुआ। इसने भारतीय इक्विटी मार्केट में आई गिरावट को संभालने में मदद की, जहाँ Sensex करीब 8.31% और Nifty 5.22% गिरा। इस डाइवर्सिफिकेशन की वजह से कई प्योर इक्विटी फंड्स के घाटे में रहने के बावजूद, Multi-Asset Funds ने औसतन 12% रिटर्न दिया, और कुछ टॉप परफॉर्मर्स ने तो करीब 26% तक का रिटर्न कमाया। हाइब्रिड फंड्स में भारी इनफ्लो देखा गया, जो संतुलित रणनीतियों की ओर बढ़ता रुझान दिखाता है।

गोल्ड और डेट ने संभाला इक्विटी का गिरता ग्राफ

पिछले साल भारतीय बाजारों के लिए कई चुनौतियाँ थीं, जिनमें भू-राजनीतिक तनाव, ऊंचे ऑयल प्राइसेज और इन्फ्लेशन (Inflation) का डर शामिल था। ऐसे में FPIs (Foreign Portfolio Investors) का आउटफ्लो भी देखा गया। Multi-Asset Funds का स्ट्रक्चर इन झटकों को झेलने में मददगार साबित हुआ। गोल्ड और अन्य कमोडिटीज ने करेंसी में गिरावट और महंगाई के खिलाफ हेजिंग का काम किया, जबकि डेट पोर्शन ने पोर्टफोलियो को स्थिरता प्रदान की। यह रणनीति डोमेस्टिक इक्विटी फंड्स से बिल्कुल अलग थी, जिनमें से कई फंड्स ने पिछले साल नुकसान दर्ज किया।

ऊंची छलांग के बजाय लगातार ग्रोथ

इन फंड्स की अपील सिर्फ हाल की परफॉरमेंस तक सीमित नहीं है। इन्होंने लम्बे समय में भी लगातार रिटर्न दिया है। पिछले तीन सालों में इन्होंने औसतन 16.26%, पाँच सालों में 14.05% और दस सालों में 10.92% का रिटर्न दिया है। कुछ स्कीम्स का 3-साल का एनुअलाइज्ड रिटर्न 18.55% और 5-साल का रिटर्न 15.70% रहा है। ये फंड्स बाज़ार में तेजी के दौरान सबसे ज़्यादा रिटर्न का पीछा करने के बजाय, स्मूथ, रिस्क-एडजस्टेड परफॉरमेंस देने और बड़ी गिरावटों को कम करने के लिए डिजाइन किए गए हैं। वोलेटिलिटी को कम करने पर इनका फोकस उन्हें मॉडरेट रिस्क टॉलरेंस वाले निवेशकों के लिए आकर्षक बनाता है।

निवेशक सुरक्षा चाहते हैं, इनफ्लो में आई तेज़ी

शानदार परफॉरमेंस ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है, जिसके चलते एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) ₹1.83 लाख करोड़ के पार चला गया है। जनवरी 2026 में Multi-Asset Funds में रिकॉर्ड ₹10,485 करोड़ का मासिक इनफ्लो देखा गया, जिसके बाद फरवरी 2026 में ₹8,476 करोड़ का इनफ्लो आया। अप्रैल 2026 में कुल म्यूचुअल फंड इनफ्लो ₹3.22 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया, जिसमें डेट फंड्स सबसे आगे रहे। यह बड़े अनिश्चित माहौल में कैपिटल प्रिजर्वेशन और डाइवर्सिफाइड स्ट्रैटेजीज़ की ओर बढ़ते निवेशक ट्रेंड को दर्शाता है।

कब पड़ सकते हैं ये फंड्स फीके?

अपनी सफलता के बावजूद, इन फंड्स की कुछ सीमाएं भी हैं। इनका परफॉरमेंस काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि विभिन्न एसेट क्लास कैसा प्रदर्शन करते हैं। हर क्लास में 10% का अनिवार्य आवंटन तब रिटर्न को कम कर सकता है जब कोई एक एसेट क्लास बहुत खराब प्रदर्शन करे। मज़बूत इक्विटी बुल मार्केट्स में, Multi-Asset Funds प्योर इक्विटी कैटेगरी से पीछे रह सकते हैं, क्योंकि इनका इक्विटी एक्सपोजर आमतौर पर 30% से 65% तक सीमित होता है। बढ़ती ब्याज दरें भी एक जोखिम पैदा करती हैं, जो डेट कंपोनेंट और इक्विटी वैल्यूएशन्स को प्रभावित कर सकती हैं। फंड मैनेजर का एसेट एलोकेशन स्किल यहाँ बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि एक ही SEBI कैटेगरी में फंड्स के इक्विटी एलोकेशन में काफी भिन्नता हो सकती है, जिससे अलग-अलग रिस्क और रिटर्न आउटकम देखने को मिलते हैं। एग्रेसिव हाइब्रिड फंड्स की तुलना में, Multi-Asset Funds में ग्रोथ की संभावना थोड़ी कम हो सकती है। एक्सपेंस रेशियो (Expense Ratio), जो डायरेक्ट प्लान के लिए आमतौर पर 0.23% से 1% के बीच होता है, वह भी नेट रिटर्न को प्रभावित कर सकता है।

आगे का नज़रिया: स्टेबिलिटी और ग्रोथ का संतुलन

एनालिस्ट्स (Analysts) वोलेटिलिटी (Volatility) को मैनेज करने में Multi-Asset Funds की भूमिका को स्वीकार करते हैं, लेकिन इनका हर मार्केट साइकिल में बेहतर प्रदर्शन करना तय नहीं है। एक मज़बूत इक्विटी बुल मार्केट, खासकर जब कमोडिटी प्राइसेज गिरें, तो प्योर इक्विटी फंड्स फिर से लीड कर सकते हैं। पिछले छह महीनों में, Multi-Asset Funds के आवंटन में बदलाव आया है, जिसमें डेरिवेटिव्स, यूटिलिटीज और रियल एस्टेट में निवेश बढ़ा है, जबकि टेक्नोलॉजी और सिक्योरिटाइजेशन में एक्सपोजर कम हुआ है। इस कैटेगरी की ताकत इसके लॉन्ग-टर्म रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न प्रोफाइल में है, जो इसे एग्रेसिव शॉर्ट-टर्म गेन्स के बजाय स्टेबिलिटी और कंसिस्टेंट वेल्थ क्रिएशन को प्राथमिकता देने वाले निवेशकों के लिए एक स्ट्रैटेजिक विकल्प बनाती है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.