डेट फंड्स से भारी निकासी, इक्विटी में निवेश का बढ़ता रुझान
इस बड़े उलटफेर के तहत, फरवरी 2026 में जहाँ ₹73,589 करोड़ का इनफ्लो (inflow) देखा गया था, वहीं मार्च में ₹2.2 लाख करोड़ का भारी आउटफ्लो (outflow) दर्ज किया गया। मनी मार्केट फंड्स में निवेशकों ने सबसे ज्यादा बिकवाली की, जहाँ ₹1.95 लाख करोड़ बाहर निकले। फिक्स्ड इनकम फंड्स से भी ₹76,354 करोड़ निकले, जबकि लिक्विड फंड्स से अकेले ₹1.35 लाख करोड़ की निकासी हुई। इन बड़ी निकासी के पीछे इंटरेस्ट रेट्स (interest rates) को लेकर निवेशकों की संवेदनशीलता और डेट-ओरिएंटेड प्रोडक्ट्स में रिडेम्पशन डिमांड्स (redemption demands) को मुख्य कारण बताया जा रहा है।
इक्विटी में लगातार निवेश, लार्ज-कैप को प्राथमिकता
इसके विपरीत, इक्विटी फंड्स में निवेशकों का भरोसा बना रहा। इक्विटी फंड्स में 11% की बढ़ोतरी के साथ ₹46,501 करोड़ का नेट इनफ्लो हुआ। इस इनफ्लो का बड़ा हिस्सा लार्ज-कैप फंड्स में गया, जिन्होंने ₹28,558 करोड़ आकर्षित किए। यह बड़ी कंपनियों में स्थिरता और क्वालिटी की तलाश को दर्शाता है। फ्लेक्सी-कैप और मिड-कैप कैटेगरी में भी लगातार निवेश जारी रहा। हालांकि, आर्बिट्रेज फंड्स से ₹22,000 करोड़ से ज्यादा की निकासी हुई। रिटेल निवेशकों की भागीदारी सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान्स (SIPs) के जरिए लगातार मजबूत बनी रही, जिसके तहत मार्च में ₹32,087 करोड़ का रिकॉर्ड इनफ्लो हुआ।
मार्केट करेक्शन और सेक्टोरल शिफ्ट
बाजार की चाल पर नजर डालें तो, मार्च में एक बड़ी करेक्शन (correction) देखने को मिली। निफ्टी 50 (Nifty 50) ने पिछले छह सालों में अपना सबसे बड़ा मासिक गिरावट दर्ज की, जो 11.36% रही। मिड-कैप और स्मॉल-कैप इंडेक्स में भी भारी गिरावट आई, जहाँ निफ्टी मिडकैप 100 (Nifty Midcap 100) ईयर-टू-डेट (year-to-date) 12.65% नीचे चला गया। बावजूद इसके, एक महीने के अंदर स्मॉल-कैप्स 8.1%, मिड-कैप्स 6.9% और लार्ज-कैप्स 4.8% चढ़े। पैसिव इक्विटी फंड्स में ₹30,235 करोड़ का रिकॉर्ड इनफ्लो देखा गया, जो बाजार की गिरावट पर खरीदारी का संकेत देता है। निवेशक डोमेस्टिक कैपिटल एक्सपेंडिचर (domestic capital expenditure) और हेल्थकेयर थीम्स (healthcare themes) जैसे मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, डिफेंस और फार्मास्युटिकल्स से जुड़े फंड्स की ओर बढ़े।
ग्लोबल अनिश्चितता और करेंसी दबाव
यह सब भू-राजनीतिक अनिश्चितता, जैसे ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष, और कमजोर हो रहे इंडियन रुपये (Indian Rupee) के बीच हुआ। इन घटनाओं ने ऑयल प्राइसेज (oil prices) को प्रभावित किया और इन्फ्लेशन (inflation) की चिंताएं बढ़ाईं। यूएस डॉलर इंडेक्स (DXY) ने मार्च में मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण 100 का स्तर फिर से हासिल कर लिया, जो ग्लोबल अनिश्चितता में डॉलर की मजबूती को दर्शाता है।
जारी जोखिम और सतर्कता
फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) ने बिकवाली जारी रखी, मार्च में रिकॉर्ड आउटफ्लो देखा गया। भारतीय इक्विटी मार्केट का प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेश्यो लगभग 21.550 के आसपास है, जो लॉन्ग-टर्म हिस्टॉरिकल एवरेज (long-term historical averages) की तुलना में प्रीमियम माना जा रहा है और रिस्क-ऑफ एनवायरनमेंट (risk-off environment) में संवेदनशील हो सकता है। जियोपॉलिटिकल इंस्टेबिलिटी (geopolitical instability) और रुपये पर इसका असर बने रहने वाले जोखिम हैं।
आगे का रास्ता
बाजार एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ डोमेस्टिक पॉजिटिव फैक्टर्स को ग्लोबल अनिश्चितताओं पर हावी होना होगा ताकि सेलेक्टिव रिकवरी (selective recovery) से आगे बढ़कर सस्टेनेबल गेन्स (sustainable gains) देखे जा सकें।
