Indian Passive Funds: मिडकैप, सेक्टर और फैक्टर ETFs में निवेशकों का बढ़ता इंटरेस्ट!

MUTUAL-FUNDS
Whalesbook Logo
AuthorMehul Desai|Published at:
Indian Passive Funds: मिडकैप, सेक्टर और फैक्टर ETFs में निवेशकों का बढ़ता इंटरेस्ट!

भारतीय निवेशक अब सिर्फ ब्रॉड मार्केट इंडेक्स से आगे बढ़कर खास सेक्टर्स या स्ट्रैटेजी में निवेश करने के लिए पैसिव फंड्स (Passive Funds) जैसे ETF और इंडेक्स फंड्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। नतीजों से पता चलता है कि मिडकैप, IT सेक्टर और फैक्टर-बेस्ड स्ट्रैटेजी में बड़ी रकम लगाई गई है।

खास इंडेक्स की ओर बढ़ रहे निवेशक

भारत में पैसिव इन्वेस्टिंग (Passive Investing) अब और ज़्यादा स्पेशलाइज्ड (Specialized) हो रही है। निवेशक अब खास लक्ष्यों को ध्यान में रखकर अपने पोर्टफोलियो बना रहे हैं। जहां पहले सब लोग मार्केट को ट्रैक करने वाले इंडेक्स फंड्स (Index Funds) में पैसा लगाते थे, वहीं अब एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स (ETFs) और इंडेक्स फंड्स के ज़रिए खास मार्केट सेगमेंट्स और थीम्स (Themes) को टारगेट करने का ट्रेंड तेज़ी से बढ़ा है।

₹11,600 करोड़ से ज़्यादा मिडकैप और स्मॉलकैप में

निवेशकों ने Nifty Next 50 के साथ-साथ खास मिडकैप (Midcap) और स्मॉलकैप (Smallcap) इंडेक्स को ट्रैक करने वाले पैसिव प्रोडक्ट्स में ₹11,600 करोड़ से ज़्यादा का निवेश किया है। यह दिखाता है कि लोग सिर्फ टॉप 50 कंपनियों से आगे बढ़कर मिड-साइज़ और छोटी कंपनियों में ग्रोथ की तलाश कर रहे हैं, जिनमें मार्केट लीडर्स के मुकाबले अलग रिटर्न प्रोफाइल हो सकता है।

सेक्टोरल और फैक्टर-बेस्ड इन्वेस्टिंग का जलवा

सेक्टर-स्पेसिफिक पैसिव फंड्स (Sector-Specific Passive Funds) भी काफी पॉपुलर हो रहे हैं। खासकर, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT) सेक्टर ने बड़ी संख्या में निवेश आकर्षित किया है, जिसमें ₹4,200 करोड़ से ज़्यादा का इनफ्लो (Inflow) आया है। इससे पता चलता है कि निवेशक उन सेक्टर्स में अपना व्यू (View) बनाने के लिए इन लो-कॉस्ट (Low-Cost) व्हीकल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनमें उन्हें लॉन्ग-टर्म (Long-term) ग्रोथ की उम्मीद है।

मार्केट कैप और सेक्टर्स के अलावा, फैक्टर-बेस्ड इन्वेस्टिंग (Factor-Based Investing) भी मेनस्ट्रीम में आ चुकी है। वैल्यू (Value), मोमेंटम (Momentum), क्वालिटी (Quality) और इक्वल वेट (Equal Weight) जैसी स्ट्रैटेजीज़ ने ₹4,600 करोड़ के करीब पैसा आकर्षित किया है। ये तरीके खास फाइनेंशियल ट्रेड्स (Financial Traits) के आधार पर स्टॉक्स चुनने के लिए फिक्स्ड रूल्स का इस्तेमाल करते हैं, जो पहले ज़्यादातर प्रोफेशनल इंस्टीट्यूशनल मैनेजर्स (Institutional Managers) ही इस्तेमाल करते थे। खास बात यह है कि ग्रोथ-ओरिएंटेड (Growth-oriented) फैक्टर्स की तरफ लोगों का इंटरेस्ट बढ़ा है, जबकि डिफेंसिव (Defensive) और लो-वोलैटिलिटी (Low-volatility) स्ट्रैटेजीज़ में दिलचस्पी कम हुई है।

थीमेटिक फोकस और आगे का रास्ता

खास पॉलिसी (Policy) या इकोनॉमिक शिफ्ट्स (Economic Shifts) पर आधारित थीमेटिक फंड्स (Thematic Funds) में कैपिटल (Capital) ज़्यादा कंसन्ट्रेट (Concentrate) हो रहा है। डिफेंस (Defence) और कैपिटल मार्केट्स (Capital Markets) जैसे एरियाज़ में लगातार ध्यान दिया जा रहा है, क्योंकि निवेशक उन थीम्स को प्राथमिकता दे रहे हैं जिनमें विजिबल लॉन्ग-टर्म पोटेंशियल (Visible Long-term Potential) है।

इंडिविजुअल निवेशकों (Individual Investors) के लिए, यह बदलाव उनके एसेट एलोकेशन (Asset Allocation) को फाइन-ट्यून (Fine-tune) करने के ज़्यादा टूल्स दे रहा है। हालांकि, स्पेशलाइज्ड पैसिव प्रोडक्ट्स की ओर इस मूव के लिए स्टैंडर्ड इंडेक्स फंड्स की तुलना में इन फंड्स के काम करने के तरीके को बेहतर ढंग से समझने की ज़रूरत है। जहां पैसिव फंड्स आम तौर पर ट्रांसपेरेंसी (Transparency) और एक्टिवली मैनेज्ड फंड्स (Actively Managed Funds) की तुलना में कम एक्सपेंस रेशियो (Expense Ratio) ऑफर करते हैं, वहीं निवेशकों को अंडरलाइंग इंडेक्स कंपोजीशन (Index Composition) और इन ETFs की लिक्विडिटी (Liquidity) पर भी नज़र रखनी चाहिए।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.