बाजार की उठापटक का फायदा उठाने के लिए अब एसेट मैनेजमेंट कंपनियां नए Contra Funds लॉन्च कर रही हैं। SEBI की नई गाइडलाइंस के बाद ये फंड्स उन सेक्टर्स पर दांव लगा रहे हैं जिन्हें बाजार ने फिलहाल नजरअंदाज कर दिया है। हालांकि, इनमें 'वैल्यू ट्रैप' का बड़ा जोखिम भी है।
बाजार की बदलती हवा
फरवरी 2026 में SEBI द्वारा जारी अपडेट के बाद से म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में एक नई हलचल देखने को मिल रही है। रेगुलेटर ने साफ कर दिया है कि फंड हाउस अब वैल्यू (Value) और कॉन्ट्रा (Contra) दोनों तरह की स्कीम्स पेश कर सकते हैं, बशर्ते उनके पोर्टफोलियो में 50% से ज्यादा ओवरलैप न हो। इस दिशा में Bandhan AMC, ICICI Prudential AMC और Motilal Oswal AMC जैसे बड़े नाम पहले से ही सक्रिय हो चुके हैं, जबकि WhiteOak Capital AMC जैसे प्लेयर्स भी रेगुलेटरी मंजूरी पाने की दौड़ में हैं।
कॉन्ट्रा फंड्स कैसे काम करते हैं?
ट्रेडिशनल इक्विटी स्कीम्स के उलट, कॉन्ट्रा फंड्स 'भीड़' से अलग चलने में यकीन रखते हैं। ये मैनेजर उन कंपनियों या सेक्टर्स की तलाश करते हैं जो बाजार में गलत कारणों से पिटे हुए हैं या जिन्हें अनदेखा किया गया है। इनका मकसद ऐसे 'ट्रिगर' को पहचानना है—जैसे सरकारी नीतियों में बदलाव या तकनीकी बदलाव—जो भविष्य में कंपनी की किस्मत बदल सके।
रिस्क फैक्टर: 'वैल्यू ट्रैप' से सावधान
इस रणनीति के साथ सबसे बड़ा खतरा 'वैल्यू ट्रैप' का होता है। अक्सर निवेशक सस्ता समझकर शेयर खरीद तो लेते हैं, लेकिन कंपनी की हालत सुधरने के बजाय और खराब होती चली जाती है। अगर मार्केट का मूड लंबे समय तक नकारात्मक बना रहता है, तो ये फंड्स सालों तक खराब परफॉर्मेंस दे सकते हैं।
रिटेल निवेशकों के लिए सलाह
फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि कॉन्ट्रा फंड्स को अपने पोर्टफोलियो का 'कोर' (Core) हिस्सा न बनाएं। इन्हें केवल 'सैटेलाइट' (Satellite) होल्डिंग के तौर पर रखना समझदारी है, यानी पोर्टफोलियो का एक छोटा हिस्सा। चूंकि ये फंड्स बाजार के ट्रेंड के खिलाफ दांव लगाते हैं, इसलिए इनमें भारी उतार-चढ़ाव (Volatility) की संभावना बनी रहती है। निवेश करने से पहले यह देखना जरूरी है कि फंड मैनेजर सेक्टर एक्सपोजर को कैसे मैनेज कर रहे हैं और क्या लंबी अवधि में उनके टर्नअराउंड की थ्योरी काम कर रही है।
