भारतीय म्यूचुअल फंड्स ने FY 2025-26 में अपने विदेशी निवेश को **23.9%** बढ़ाकर **$10.2 बिलियन** तक पहुंचा दिया है। ग्लोबल डाइवर्सिफिकेशन की इस रणनीति से सेक्टर की नेट फॉरेन लायबिलिटीज घटकर **$21.3 बिलियन** रह गई हैं।
भारतीय म्यूचुअल फंड्स ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान अपने ग्लोबल पोर्टफोलियो में भारी विस्तार किया है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के आंकड़ों के अनुसार, फंड हाउसों ने विदेशी बाजारों में अपनी हिस्सेदारी 23.9% बढ़ा दी है। इस निवेश का 63% से अधिक हिस्सा अकेले अमेरिकी बाजारों में लगा है, जो यह दर्शाता है कि भारतीय फंड मैनेजर ग्लोबल इक्विटी एक्सपोजर को लेकर काफी उत्साहित हैं।
बैलेंस शीट पर असर
इस रणनीतिक बदलाव का सीधा असर सेक्टर की बैलेंस शीट पर दिखा है। म्यूचुअल फंड्स ने अपनी नेट फॉरेन लायबिलिटीज को पिछले साल के $22.3 बिलियन से कम करके $21.3 बिलियन पर ला दिया है। यह सुधार यह बताता है कि भारतीय फंड हाउस अब बाहरी निवेश और घरेलू पूंजी के बीच बेहतर संतुलन बना रहे हैं।
भारतीय AMCs में विदेशी दिलचस्पी
सिर्फ फंड्स ही नहीं, विदेशी निवेशकों की नजरें भारतीय एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) पर भी हैं। भारत में म्यूचुअल फंड सेक्टर में आए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में 18.1% की शानदार बढ़त दर्ज की गई है, जो $8.7 बिलियन के स्तर पर पहुंच गया है। इसमें जापान और कनाडा के निवेशकों का योगदान लगभग 80% रहा है, जो भारतीय फाइनेंशियल इकोसिस्टम पर ग्लोबल भरोसा दिखाता है।
निवेशकों के लिए चुनौतियां
इतने बड़े निवेश के बावजूद, निवेशकों को कुछ बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है:
- रेगुलेटरी लिमिट: विदेशी निवेश पर नियामक सीमाएं (Regulatory Ceilings) कभी-कभी फंड हाउसों के लिए नई पूंजी जुटाने में बाधा बन जाती हैं।
- करेंसी रिस्क: अंतरराष्ट्रीय फंड्स का प्रदर्शन रुपये और डॉलर के उतार-चढ़ाव से सीधा जुड़ा होता है। अगर रुपया मजबूत होता है, तो विदेशी होल्डिंग्स की वैल्यू में गिरावट आ सकती है, जो रिटर्न्स को प्रभावित कर सकती है।
भविष्य में, निवेशकों को फंड्स द्वारा करेंसी रिस्क मैनेजमेंट और रेगुलेटरी नियमों में बदलावों पर नजर रखनी चाहिए।
