अप्रैल में भारतीय शेयर बाज़ार में ज़बरदस्त तेज़ी देखी गई। जहां Sensex 7% चढ़ा, वहीं Nifty 7.5% की छलांग लगा गया। मिड-कैप और स्मॉल-कैप इंडेक्स तो और भी तेज़, 12.7% और 18% तक उछले।
मगर इस तूफानी तेज़ी के बीच, म्यूचुअल फंड्स ने अपनी तिजोरियों में ₹1.99 लाख करोड़ की मोटी रकम रोक ली। यह आंकड़ा बताता है कि फंड मैनेजर्स पूरी तरह से बाज़ार में निवेश करने से कतरा रहे थे।
वैल्यूएशन को लेकर चिंता
ACE Equities के आंकड़ों के मुताबिक, सर्वे में शामिल 53 फंड हाउसेस में से 30 ने अपनी इक्विटी स्कीम्स में कैश होल्डिंग्स बढ़ाईं। इसकी मुख्य वजह है शेयरों का बढ़ता वैल्यूएशन। फंड मैनेजर्स को डर है कि कहीं मौजूदा कीमतें उनकी उम्मीदों से ज़्यादा न बढ़ गई हों।
फंड हाउसेस की रणनीति
इसलिए, ये मैनेजर्स अब उन कंपनियों में निवेश पर ज़ोर दे रहे हैं जहां कमाई की अच्छी संभावना है और वैल्यूएशन भी ठीक-ठाक है। वे बड़े जोखिम लेने से बच रहे हैं।
अलग-अलग फंड हाउसेस की रणनीतियाँ थोड़ी भिन्न रहीं। उदाहरण के लिए, ICICI Prudential MF ने अपनी कैश होल्डिंग 3.5% से बढ़ाकर 4.11% कर दी। DSP MF ने इसे 4.81% से बढ़ाकर 6.82% किया, और HDFC MF 5.08% से 5.11% पर आया। Quant MF ने तो अपनी कैश रिजर्व 13.8% से बढ़ाकर 14.38% कर दिया। हालांकि, कुछ फंड्स ने कैश कम भी किया, जैसे PPFAS MF ने 21.76% से 18.7% और Axis MF ने 9.31% से 7.6%।
ज़्यादा कैश रखने से पोर्टफोलियो को अचानक गिरावट से बचाया जा सकता है, लेकिन बाज़ार के ऊपर जाने पर यह फंड्स के रिटर्न को धीमा कर सकता है। ऐसे में, फंड मैनेजर्स को जोखिम प्रबंधन और रिटर्न जनरेशन के बीच संतुलन बनाना होता है। फिलहाल, बाज़ार की तेज़ चाल के बावजूद, ज़्यादातर सावधानी बरतते नज़र आ रहे हैं।
