म्यूचुअल फंड AUM ₹85.76 लाख करोड़ पार, पैसिव फंड्स में 324% की बंपर ग्रोथ!

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
म्यूचुअल फंड AUM ₹85.76 लाख करोड़ पार, पैसिव फंड्स में 324% की बंपर ग्रोथ!

भारतीय म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री ने एक बड़ा मुकाम हासिल किया है। जुलाई 2026 तक, फंड्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) बढ़कर **₹85.76 लाख करोड़** हो गया है। इसमें सबसे खास बात यह है कि पैसिव फंड्स (Passive Funds) पिछले पांच सालों में **324%** की रफ़्तार से बढ़े हैं। यह दिखाता है कि निवेशक अब कम लागत वाले, मार्केट-लिंक्ड प्रोडक्ट्स को ज्यादा पसंद कर रहे हैं।

म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री का नया शिखर

भारतीय म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री ने एक बड़ा मुकाम हासिल किया है। जुलाई 2026 तक, फंड्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) बढ़कर ₹85.76 लाख करोड़ हो गया है। यह आंकड़ा बताता है कि रिटेल निवेशक अब अपनी दौलत को मैनेज करने के तरीके में बड़ा बदलाव ला रहे हैं। खासकर, इंडेक्स फंड्स (Index Funds) और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETFs) जैसे पैसिव इन्वेस्टमेंट व्हीकल्स (Passive Investment Vehicles) पोर्टफोलियो का अहम हिस्सा बन गए हैं। पिछले पांच सालों में, इन पैसिव प्रोडक्ट्स का एसेट 324% बढ़कर ₹15.15 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, जो इंडस्ट्री की ओवरऑल ग्रोथ से काफी ज़्यादा है।

निवेशकों के बदलते आदतें

यह बदलाव निवेशकों के व्यवहार में एक बड़ा परिवर्तन दिखाता है। जहां पहले भारतीय निवेशक मार्केट को मात देने के लिए एक्टिव फंड्स (Active Funds) को ज़्यादा चुनते थे, वहीं अब कम लागत वाले, मार्केट-लिंक्ड ऑप्शन्स की ओर एक स्पष्ट झुकाव दिख रहा है। इस ट्रेंड का असर इन्वेस्टर अकाउंट्स (या फोलियो) की संख्या में आई ज़बरदस्त बढ़ोतरी में भी साफ दिखता है, जो बढ़कर 28.09 करोड़ हो गए हैं। इनमें पैसिव फंड फोलियो की संख्या पिछले पांच सालों में पांच गुना बढ़कर 5.54 करोड़ हो गई है। इक्विटी-ओरिएंटेड फंड्स (Equity-oriented Funds) ने भी अच्छी ग्रोथ दिखाई है, जिनका AUM 224% बढ़कर ₹38.40 लाख करोड़ पर पहुंच गया है।

पैसिव फंड्स की ओर झुकाव के कारण

निवेशकों के लिए पैसिव प्रोडक्ट्स की ओर यह बदलाव अक्सर सादगी (Simplicity) और लागत-दक्षता (Cost-efficiency) के कारण होता है। पैसिव फंड सीधे मार्केट इंडेक्स को ट्रैक करते हैं, जिससे एक्टिव स्टॉक पिकिंग की ज़रूरत खत्म हो जाती है। साथ ही, इन फंड्स के मैनेजमेंट चार्जेस (Management Fees) भी ट्रेडिशनल फंड्स की तुलना में कम होते हैं। यह उन निवेशकों के लिए एक आकर्षक विकल्प है जो एक्टिव फंड मैनेजर्स का मूल्यांकन करने की जटिलता के बिना व्यापक मार्केट एक्सपोजर चाहते हैं।

इंडस्ट्री और निवेशकों के लिए ज़रूरी बातें

हालांकि, यह बड़ा स्ट्रक्चरल शिफ्ट इंडस्ट्री और निवेशकों दोनों के लिए कुछ ज़रूरी बातें लेकर आता है। एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) के लिए, पैसिव प्रोडक्ट्स की ओर बढ़ते झुकाव से मार्जिन पर दबाव आ सकता है। पैसिव फंड्स पर आमतौर पर एक्टिव फंड्स की तुलना में कम फीस स्ट्रक्चर होता है, जिसका मतलब है कि कंपनियों को प्रॉफिटेबिलिटी बनाए रखने के लिए बड़े पैमाने पर काम करना होगा। निवेशक यह देख सकते हैं कि बड़ी AMCs इस बदलाव के जवाब में अपने प्रोडक्ट मिक्स और फीस मॉडल को कैसे एडजस्ट करती हैं।

छिपे हुए रिस्क

इस बदलाव में कुछ अंतर्निहित रिस्क (Inherent Risks) भी हैं। चूंकि पैसिव फंड्स सिर्फ एक इंडेक्स को ट्रैक करते हैं, इसलिए मार्केट में गिरावट के दौरान ये कोई डाउनसाइड प्रोटेक्शन (Downside Protection) नहीं देते, जबकि एक्टिव मैनेजर्स मंदी के समय कैश या डिफेंसिव सेक्टर्स में जा सकते हैं। इसके अलावा, जैसे-जैसे ज़्यादा कैपिटल खास इंडेक्स-लिंक्ड प्रोडक्ट्स में बहता है, कंसंट्रेशन रिस्क (Concentration Risk) बढ़ रहा है। यह तब होता है जब कुछ लोकप्रिय स्टॉक्स में भारी इनफ्लो उन इंडेक्स के भीतर ओवरवैल्यूएशन (Overvaluation) का कारण बन सकता है। साथ ही, मार्केट की वोलेटिलिटी (Market Volatility) एक बड़ा फैक्टर बनी रहेगी, क्योंकि ये प्रोडक्ट्स मार्केट मूवमेंट्स के सीधे, अनहेज्ड एक्सपोजर प्रदान करते हैं। निवेशक इस पैसिव-हैवी स्ट्रेटेजी की लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी (Long-term Sustainability) को समझने के लिए भविष्य के मंथली इनफ्लो ट्रेंड्स (Monthly Inflow Trends) और मार्केट वोलेटिलिटी में संभावित बदलावों पर नज़र रख सकते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.