भारतीय पैसिव इन्वेस्टमेंट मार्केट में बड़ा बदलाव आया है। मार्च 2026 तक ETF का मार्केट शेयर घटकर **65.1%** रह गया है, जबकि इंडेक्स फंड्स का एसेट बेस **₹3.07 लाख करोड़** के पार पहुंच गया है। रिटेल निवेशक अब ट्रेडिंग की झंझट के बजाय ऑटोमेटेड SIP को तरजीह दे रहे हैं।
भारतीय रिटेल निवेशकों के निवेश करने का तरीका तेजी से बदल रहा है। लंबे समय तक कम लागत वाले पैसिव इन्वेस्टमेंट के तौर पर Exchange Traded Funds (ETFs) का जलवा था, लेकिन मार्च 2026 के ताजा आंकड़े एक अलग ही तस्वीर पेश कर रहे हैं। पैसिव इन्वेस्टमेंट स्पेस में ETFs का दबदबा कम हो रहा है और इनका मार्केट शेयर जो मार्च 2021 में 89.2% था, अब घटकर 65.1% पर आ गया है। वहीं, इंडेक्स फंड्स ने 74.1% की पांच-सालाना कंपाउंड ग्रोथ के साथ बाजी मार ली है।
सुविधा बनाम लागत (Convenience vs Cost)
इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह खरीद-फरोख्त का तरीका है। ETFs एक शेयर की तरह काम करते हैं, जिसके लिए डीमैट अकाउंट जरूरी है। साथ ही, इसमें ब्रोकरेज फीस, बिड-आस्क स्प्रेड और लिक्विडिटी की समस्याएं होती हैं, जो आम निवेशकों के लिए सिरदर्द बन जाती हैं।
इसके उलट, इंडेक्स फंड्स म्यूचुअल फंड की तरह काम करते हैं। इसमें आप आसानी से ऑटोमेटेड SIP सेट कर सकते हैं। भले ही इंडेक्स फंड्स का एक्सपेंस रेशियो (Expense Ratio) ETFs के मुकाबले थोड़ा ज्यादा हो, लेकिन निवेशक 'ऑटोमेशन' की सुविधा के लिए यह अतिरिक्त लागत चुकाने को तैयार हैं।
डिस्ट्रीब्यूटर्स का बड़ा रोल
इस ट्रेंड में फाइनेंशियल डिस्ट्रीब्यूटर्स का भी बड़ा हाथ है। अक्सर इंडेक्स फंड्स बेचने पर डिस्ट्रीब्यूटर्स को ETF के मुकाबले बेहतर कमीशन मिलता है। वर्तमान में 78% छोटे SIP कंट्रीब्यूशन डिस्ट्रीब्यूटर नेटवर्क के जरिए ही आ रहे हैं, जो निवेश के रुख को तय करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
निवेशकों के लिए क्या है जोखिम?
इंडेक्स फंड्स में निवेश आसान तो है, लेकिन निवेशकों को लागत के अंतर को समझना चाहिए। लंबे समय में ज्यादा एक्सपेंस रेशियो नेट रिटर्न पर असर डाल सकता है। इसके अलावा, ETFs में रियल-टाइम प्राइसिंग मिलती है, जबकि इंडेक्स फंड्स की कीमत दिन के अंत में NAV के आधार पर तय होती है। कुल मिलाकर, जहां म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री का एसेट बेस ₹73.73 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, वहीं निवेशकों को यह देखते रहना होगा कि क्या आने वाले समय में इंडेक्स फंड्स और ETFs के बीच का लागत का अंतर कम होता है या नहीं।
