अगर आप विदेशी बाजारों में निवेश करने वाले इंटरनेशनल ETFs में पैसा लगा रहे हैं, तो सावधान हो जाएं। RBI की निवेश सीमा (Limit) खत्म होने के कारण ये ETFs अपनी असल वैल्यू (NAV) से **60%** तक महंगे बिक रहे हैं, जो रिटेल निवेशकों के लिए बड़ा जोखिम बन सकता है।
भारत के रिटेल निवेशक इस समय ग्लोबल एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स (ETFs) के जाल में फंस रहे हैं। ये फंड्स जो अमेरिकी Nasdaq जैसे इंटरनेशनल बाजारों को ट्रैक करते हैं, वे अपनी नेट एसेट वैल्यू (NAV) से कहीं अधिक कीमत पर ट्रेड हो रहे हैं। कई मामलों में तो यह प्रीमियम 60% तक पहुंच चुका है। इसका मतलब है कि आप ₹100 की एसेट के लिए ₹160 चुका रहे हैं।
क्यों पैदा हुआ यह संकट?
इसकी मुख्य वजह रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा तय की गई निवेश सीमा है। म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री के लिए विदेशी निवेश की कुल लिमिट $1 बिलियन है, जबकि एक सिंगल एसेट मैनेजमेंट कंपनी के लिए यह कैप $300 मिलियन है। चूंकि ये लिमिट्स पहले ही पूरी हो चुकी हैं, इसलिए फंड हाउस नए यूनिट्स जारी नहीं कर पा रहे हैं। मार्केट में सप्लाई रुकी हुई है, लेकिन डिमांड लगातार बनी हुई है, जिससे सेकेंडरी मार्केट में इनकी कीमतें आसमान छू रही हैं।
निवेशकों के लिए जोखिम (Risk Assessment)
यह प्रीमियम कभी भी गिर सकता है। अगर आप 50% प्रीमियम पर खरीदारी करते हैं और मार्केट प्राइस वापस NAV के करीब आता है, तो आपको 33% तक का बड़ा कैपिटल लॉस हो सकता है, भले ही संबंधित विदेशी स्टॉक की वैल्यू में कोई गिरावट न आई हो। SEBI के नए प्राइस-बैंड फ्रेमवर्क ने भी इसे अनजाने में बढ़ावा दिया है, क्योंकि सर्किट ब्रेकर अब NAV के बजाय पिछले दिन के क्लोजिंग प्राइस पर काम करते हैं।
विकल्प क्या है?
अगर आप इस 'प्रीमियम ट्रैप' से बचना चाहते हैं, तो लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के जरिए सीधे विदेशी स्टॉक्स में निवेश करना एक विकल्प है। हालांकि, इसमें टैक्स कलेक्टेड एट सोर्स (TCS) और थोड़ी पेचीदा पेपरवर्क प्रक्रिया शामिल है। निवेश करने से पहले अपने फंड हाउस की वेबसाइट पर जाकर रोज अपडेट होने वाली NAV जरूर चेक करें ताकि आपको पता रहे कि आप असल में कितने पैसे फालतू दे रहे हैं।
