ग्लोबल अनिश्चितता के बीच घरेलू ग्रोथ पर फोकस
दुनिया भर के अनिश्चित आर्थिक माहौल को देखते हुए, भारतीय फंड मैनेजर्स अपनी रणनीति में बड़ा फेरबदल कर रहे हैं। उनका जोर अब कैपिटल प्रिजर्वेशन (Capital Preservation) और स्टेबिलिटी (Stability) पर है, जिसके लिए वे लार्ज-कैप शेयरों और छोटी अवधि वाले डेट फंड्स की ओर रुख कर रहे हैं। यह पिछले समय की आक्रामक ग्रोथ-ओरिएंटेड स्ट्रैटेजी से अलग है।
इक्विटी में लार्ज-कैप का दम
2025 में जहां निफ्टी 50 (Nifty 50) और सेंसेक्स (Sensex) जैसे बेंचमार्क इंडेक्स में अच्छी तेजी देखी गई, वहीं मिड-कैप और स्मॉल-कैप शेयरों का प्रदर्शन कमजोर रहा। इसी को देखते हुए फंड मैनेजर्स ने अब लार्ज-कैप शेयरों को पोर्टफोलियो का मुख्य आधार बनाया है। ये शेयर मार्केट में बड़ी गिरावट के वक्त सुरक्षा कवच का काम करते हैं। हालांकि, मिड और स्मॉल-कैप सेगमेंट में भी निवेश जारी है, लेकिन अब यह काफी सोच-समझकर किया जा रहा है। मौजूदा समय में, निफ्टी 50 का P/E रेशियो लगभग 22x और सेंसेक्स का 23x के आसपास है, जो बताता है कि वैल्यूएशन (Valuation) अभी बहुत ज्यादा नहीं बढ़े हैं, लेकिन सेलेक्टिविटी (Selectivity) जरूरी है।
सेक्टर्स में किन पर दांव?
फंड मैनेजर उन सेक्टर्स पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं जो भारत की घरेलू इकोनॉमिक ग्रोथ से सीधे जुड़े हैं और जहां कमाई की अच्छी उम्मीदें हैं।
- फाइनेंशियल सर्विसेज (Financial Services): यह अभी भी एक अहम सेक्टर है, लेकिन इसमें भी बीमा कंपनियों (Insurance Companies) को बैंकों और एनबीएफसी (NBFCs) से ज्यादा तवज्जो दी जा रही है।
- कंज्यूमर डिस्क्रिशनरी (Consumer Discretionary): ऑटो, रिटेल और ट्रैवल जैसे सेक्टर्स में कंज्यूमर खर्च बढ़ने की उम्मीद है, इसलिए इनमें ओवरवेट (Overweight) पोजीशन ली जा रही है। ऑटो एंसिलरीज (Auto Ancillaries) को ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) से ज्यादा पसंद किया जा रहा है।
- हेल्थकेयर (Healthcare): बढ़ती घरेलू मांग और ग्लोबल सप्लाई को देखते हुए हेल्थकेयर पर भी दांव लगाया जा रहा है।
- टेक्नोलॉजी (Technology): 2025 में कमजोर प्रदर्शन और ग्लोबल आईटी खर्च में अनिश्चितता को देखते हुए इस सेक्टर को अंडरवेट (Underweight) रखा गया है।
- इंडस्ट्रियल्स (Industrials): सरकारी खर्च और कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) साइकिल को देखते हुए यह सेक्टर पसंद किया जा रहा है, लेकिन वैल्यूएशन और एग्जीक्यूशन रिस्क (Execution Risk) पर नजर रखी जा रही है।
डेट मार्केट में कम ड्यूरेशन का खेल
फिक्स्ड इनकम (Fixed Income) सेगमेंट में एक बड़ा बदलाव आया है। 2025 के बॉन्ड यील्ड्स (Bond Yields) में रेंज-बाउंड (Range-bound) मूवमेंट देखा गया। इसके चलते, शॉर्ट-ड्यूरेशन (Short-Duration) और डायनामिक बॉन्ड फंड्स (Dynamic Bond Funds) ने बेहतर प्रदर्शन किया। अब फंड मैनेजर्स पोर्टफोलियो की ड्यूरेशन (Duration) यानी अवधि कम कर रहे हैं। इसका मतलब है कि अब वे इंटरेस्ट रेट्स (Interest Rates) के घटने से होने वाले कैपिटल गेन (Capital Gain) के बजाय, मिलने वाले इंटरेस्ट (Accrual/Carry) पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं। उन्होंने हाई क्रेडिट क्वालिटी (High Credit Quality) यानी ट्रिपल-ए रेटेड (AAA-rated) इंस्ट्रूमेंट्स में अपना निवेश बढ़ाया है।
जोखिम और आगे का रास्ता
इन रणनीतियों के बावजूद, कुछ जोखिम बने हुए हैं। फाइनेंशियल सेक्टर में इंटरेस्ट रेट्स बढ़ने से एसेट क्वालिटी (Asset Quality) पर असर पड़ सकता है। कंज्यूमर डिस्क्रिशनरी स्टॉक्स की वैल्यूएशन थोड़ी ऊंची है और रॉ मैटेरियल (Raw Material) की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी चिंता का विषय है। टेक्नोलॉजी सेक्टर में भी अचानक तेजी आने पर अंडर-अलॉटेड (Under-allocated) फंड्स को नुकसान हो सकता है।
कुल मिलाकर, 2026 में म्यूचुअल फंड्स की पोजीशन घरेलू इकोनॉमिक रेसिलिएंस (Resilience) पर आधारित है, जिसमें स्टेबल और क्वालिटी एसेट्स (Quality Assets) को प्राथमिकता दी जा रही है।
