DSP Mutual Fund की सितंबर 2026 की रिपोर्ट ने निवेशकों की नींद उड़ा दी है। डेटा के मुताबिक, भारत में ज्यादातर इक्विटी फंड मैनेजर **3 साल** से कम समय तक ही अपनी भूमिका में बने रहते हैं। सिर्फ **7%** से भी कम मैनेजरों के पास **10 साल** से ज्यादा का अनुभव है, जो ऐतिहासिक रिकॉर्ड देखकर निवेश करने वाले निवेशकों के लिए बड़ा रिस्क बन गया है।
भारतीय म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। DSP Mutual Fund की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 320 एक्टिव इक्विटी फंड मैनेजरों में से केवल 20 के पास ही 10 साल से ज्यादा का तजुर्बा है। औसत कार्यकाल 3 साल से भी कम रह गया है, जो फंड हाउस के अंदर लगातार हो रहे बदलावों की ओर इशारा करता है।
'स्ट्रेटेजी ड्रिफ्ट' (Strategy Drift) का बड़ा खतरा
जब भी कोई नया फंड मैनेजर आता है, तो वह अक्सर फंड की निवेश शैली, स्टॉक सिलेक्शन या रिस्क लेने की क्षमता में बदलाव कर देता है। इसे 'स्ट्रेटेजी ड्रिफ्ट' कहते हैं। मान लीजिए आपने किसी कंजर्वेटिव लार्ज-कैप फंड में पैसा लगाया, लेकिन नए मैनेजर के आने से वह अचानक आक्रामक मिड-कैप दांव खेलने लगे, तो आपका पूरा रिस्क-रिवॉर्ड बैलेंस बिगड़ सकता है। बिना किसी जानकारी के ऐसी रणनीतियां आपके फाइनेंशियल गोल को प्रभावित कर सकती हैं।
स्टार मैनेजर नहीं, AMC की प्रोसेस पर दें ध्यान
एक्सपर्ट्स का मानना है कि अब समय आ गया है जब निवेशकों को किसी एक 'स्टार मैनेजर' के भरोसे रहने के बजाय एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC) के मजबूत फ्रेमवर्क को प्राथमिकता देनी चाहिए। एक अच्छी AMC वह है जहाँ रिसर्च टीम का इनपुट और चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर का सुपरविजन बना रहता है, ताकि फंड का कोर फिलॉसफी कायम रहे।
अगर आपके फंड में मैनेजर बदलता है, तो तुरंत घबराने की जरूरत नहीं है। कम से कम 6 से 12 महीने तक स्कीम की परफॉर्मेंस और उसकी रणनीति पर नजर रखें। यह समय आपको यह समझने के लिए काफी है कि नई लीडरशिप फंड की विरासत को आगे बढ़ा रही है या निवेश का तरीका पूरी तरह बदल गया है। अपने पोर्टफोलियो को ट्रैक करना और यह सुनिश्चित करना कि वह आज भी आपके लक्ष्य के साथ मेल खाता है, यही सबसे सुरक्षित तरीका है।
