भारतीय शेयर बाजार पिछले **25** सालों की सबसे लंबी गिरावट के दौर से गुजर रहा है। Nifty 50 गिरकर **22,300** के स्तर के करीब पहुंच गया है। विदेशी निवेशकों द्वारा **$27.8 बिलियन** की निकासी ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
भारतीय इक्विटी मार्केट के लिए यह पिछले ढाई दशकों का सबसे कठिन दौर है। 1 अक्टूबर, 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, Nifty 50 और Sensex लगातार 8 हफ्तों से लाल निशान में बंद हो रहे हैं। हाल ही में Sensex एक ही सत्र में 950 अंकों से ज्यादा टूटा है। ऑटो, मेटल और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स जैसे सेक्टरों में भारी बिकवाली देखी गई है, जबकि India VIX में उछाल के साथ बाजार में डर का माहौल है।
गिरावट की असली वजह
बाजार में इस भारी बिकवाली के पीछे विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की ताबड़तोड़ बिकवाली है। साल 2026 में अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से रिकॉर्ड $27.8 बिलियन बाहर निकाले हैं। इसकी मुख्य वजह अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड का बढ़ना और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी है, जिससे वैश्विक बाजार ज्यादा आकर्षक दिख रहे हैं। इसके अलावा, लगातार आ रहे IPOs के कारण बाजार की लिक्विडिटी पर भी दबाव बना हुआ है।
क्या बड़े फंड्स दे रहे हैं सुरक्षा?
गिरते बाजार में निवेशक यह जानने को उत्सुक हैं कि क्या उनके फंड्स नुकसान कम कर पा रहे हैं? डेटा बताता है कि केवल बड़ा फंड होना सुरक्षा की गारंटी नहीं है। हालांकि Nippon India Small Cap Fund जैसे कुछ फंड्स ने अपने बेंचमार्क के मुकाबले लचीलापन दिखाया है, लेकिन कई लार्ज-कैप और मल्टी-कैप फंड्स इस 2 महीने की गिरावट में जूझते दिखे हैं।
वहीं, HDFC Balanced Advantage Fund जैसे हाइब्रिड फंड्स भी चर्चा में हैं, जो मार्केट की स्थिति के अनुसार इक्विटी और डेट के बीच पैसा शिफ्ट करते रहते हैं। ये फंड्स उतार-चढ़ाव को कम करने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन मौजूदा बाजार दबाव से वे भी पूरी तरह अछूते नहीं हैं।
लंबी अवधि का नजरिया
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल 2 महीने के प्रदर्शन को देखकर निवेश का फैसला लेना गलत हो सकता है। फिलहाल बाजार की अस्थिरता को देखते हुए निवेशकों को घबराहट में कोई भी कदम उठाने के बजाय, अपने पोर्टफोलियो की लॉन्ग-टर्म स्थिरता पर ध्यान देना चाहिए।
