NFOs की झड़ी के पीछे AMC के अपने हित?
एसेट मैनेजमेंट कंपनियां (AMCs) लगातार नए फंड ऑफर्स (NFOs) लॉन्च कर रही हैं, और यह ट्रेंड लंबे तेजी वाले बाजार (bull market) में भी जारी है। 2020 से मार्च 2026 के बीच AMCs ने 1,187 NFOs लॉन्च किए, जिनसे ₹4.67 लाख करोड़ जुटाए गए। इनमें से 157 NFOs Thematic और Sectoral फंड्स से जुड़े थे, जिन्होंने ₹1.64 लाख करोड़ जमा किए।
जानकारों का मानना है कि AMCs ऐसा इसलिए कर रही हैं ताकि वे SEBI के उन नियमों को दरकिनार कर सकें जो एक कैटेगरी में केवल एक फंड लॉन्च करने की इजाजत देते हैं। हर नए फंड लॉन्च से AMCs को डिस्ट्रीब्यूटर कमीशन, एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) में बढ़ोतरी और एक्टिव फंड्स पर ज़्यादा फीस के रूप में सीधा फायदा होता है। 2024 में ही 239 NFOs लॉन्च हुए और ₹1.18 लाख करोड़ जुटाए गए।
ऊँची फीस और निवेशकों का घटा सिर
एक्टिव इक्विटी NFOs का मुख्य वादा होता है कि वे बाज़ार को मात देंगे और इसके बदले में ज़्यादा फीस लेंगे। लेकिन, यह वादा अक्सर पूरा नहीं होता। 2020 और मार्च 2026 के बीच लॉन्च हुए 275 एक्टिव इक्विटी NFOs में से 133 फंड्स, यानी 48%, अपने बेंचमार्क से पिछड़ गए। Sectoral और Thematic फंड्स में यह असफलता दर 50% के आसपास है।
यहीं नहीं, इन फंड्स की फीस भी पैसिव (Index) फंड्स के मुकाबले काफी ज़्यादा होती है। एक्टिवली मैनेज्ड फंड्स सालाना 1.5% से 2.5% तक फीस लेते हैं, जबकि इंडेक्स फंड्स की फीस 0.1% से 0.5% ही होती है। 2020 से 2024 के बीच लॉन्च हुए फंड्स में तो 50% से ज़्यादा की असफलता दर देखी गई, और यह तब था जब बाजार तेज़ी में था।
Thematic और Sectoral NFOs के बड़े रिस्क
Thematic और Sectoral NFOs भले ही आकर्षक लगें क्योंकि ये किसी खास ट्रेंड पर फोकस करते हैं, लेकिन इनमें ज़बरदस्त जोखिम छिपा होता है। ऐसे फंड्स अक्सर तब लॉन्च होते हैं जब किसी थीम में निवेशकों की रुचि और कीमतें पहले ही चरम पर होती हैं, जिससे वे तेज़ गिरावट का शिकार हो सकते हैं। इनका प्रदर्शन काफी साइक्लिकल (चक्रीय) होता है और आर्थिक बदलावों के प्रति संवेदनशील होता है, जिससे इनमें बड़े उतार-चढ़ाव देखे जाते हैं।
उदाहरण के लिए, HDFC Defence फंड ने अपने बेंचमार्क 52% की तुलना में 35% का CAGR दिया, वहीं Shriram Multi Sector Rotation Fund ने बेंचमार्क के -6% के मुकाबले -23% का घाटा दिखाया।
आगे क्या? निवेशकों के लिए सलाह
बाज़ार में अब डिसिप्लिन्ड इन्वेस्टिंग का चलन बढ़ रहा है और Systematic Investment Plans (SIPs) की लोकप्रियता बढ़ रही है। निवेशक अब फीस और परफॉरमेंस को लेकर ज़्यादा जागरूक हो रहे हैं। ऐसे में NFOs पर ज़्यादा पैनी नज़र रखी जाएगी।
SEBI के नए नियम भी लागत पारदर्शिता बढ़ाने और ओवरलैपिंग स्कीम्स को कम करने पर जोर दे रहे हैं। निवेशकों को याद रखना चाहिए कि नया फंड हमेशा नया मौका नहीं होता। सबसे अच्छा यही है कि ऐसे फंड्स पर ध्यान दें जिनका ट्रैक रिकॉर्ड साबित हो, जिनके निवेश के लक्ष्य स्पष्ट हों, जिनकी फीस प्रतिस्पर्धी हो और जो आपके पोर्टफोलियो के लक्ष्यों के साथ मेल खाते हों। Thematic और Sectoral NFOs में निवेश से पहले उनके साइक्लिकल स्वभाव और कंसंट्रेशन रिस्क को अच्छी तरह समझ लें।
