ग्लोबल उतार-चढ़ाव के बीच Indian stock market अपनी मजबूती दिखा रहा है, जिसे एक्सपर्ट्स 'लिक्विड ऑक्सीजन' मार्केट कह रहे हैं। हालांकि, यह स्थिरता निवेशकों के बीच लापरवाही (complacency) भी बढ़ा सकती है, जिससे बचने की सलाह दी जा रही है।
भारतीय शेयर बाजार पिछले कुछ समय से एक अजीब सी स्थिरता के दौर से गुजर रहा है। मार्केट ऑब्जर्वर्स इसे 'लिक्विड ऑक्सीजन' मार्केट का नाम दे रहे हैं—यानी एक ऐसी स्थिति जहां बाजार सांस तो ले रहा है और गिर नहीं रहा है, लेकिन किसी बड़े उछाल (ब्रेकआउट) के लिए मोमेंटम की कमी महसूस हो रही है।
क्या है लापरवाही (Complacency) का रिस्क?
इंडस्ट्री के दिग्गज चेता रहे हैं कि शांति का यह लंबा दौर रिटेल और इंस्टीट्यूशनल निवेशकों के मन में सुरक्षा का एक 'झूठा अहसास' पैदा कर सकता है। जब मार्केट की वोलैटिलिटी लंबे समय तक कम बनी रहती है, तो निवेशक अक्सर हाई वैल्युएशन जैसे बुनियादी रिस्क को नजरअंदाज करने लगते हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस 'कॉम्प्लेसेंसी' को खत्म करने और प्राइस एक्सपेक्टेशन को रिसेट करने के लिए बाजार में एक बड़ा करेक्शन जरूरी हो सकता है।
ग्लोबल ट्रेंड्स से बाहर निकलती भारतीय अर्थव्यवस्था
अब यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि भारत की घरेलू आर्थिक ताकत काफी हद तक ग्लोबल बेंचमार्क, जैसे कि US मार्केट से अलग हो गई है। Trident Capital Investments की फाउंडर और CIO सची त्रिवेदी का कहना है कि भारत ने ग्लोबल पेंडेमिक से लेकर जियो-पॉलिटिकल तनाव तक, हर मुश्किल दौर को बखूबी संभाला है। यह अनुभव आज भारतीय बाजार को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा लचीला बनाता है।
कॉर्पोरेट अर्निंग्स पर रखें नजर
DSP Mutual Fund के CIO अनीश तावकले का साफ कहना है कि रोज-रोज के प्राइस स्विंग्स के हिसाब से टाइमिंग करना आम निवेशकों के लिए अक्सर नुकसानदेह साबित होता है। निवेश का असली फोकस कंपनियों के लॉन्ग-टर्म अर्निंग्स ग्रोथ और बिजनेस की मजबूती पर होना चाहिए। मार्केट में गिरावट या तेजी के शोर के बीच, जो चीज सबसे ज्यादा मायने रखती है, वह है कंपनियों का प्रॉफिट और उनके मार्जिन्स। निवेशकों को इंडेक्स के उतार-चढ़ाव के बजाय क्वार्टरली नतीजों और डिमांड ट्रेंड्स पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि अंत में यही चीजें लॉन्ग-टर्म वैल्यू बनाती हैं।
