भारतीय शेयर बाजार में खुदरा निवेशकों का जोश चरम पर है। अगस्त 2026 में मंथली SIP कंट्रीब्यूशन **₹32,297 करोड़** के सर्वकालिक उच्च स्तर (All-time high) पर पहुंच गया है, जो इक्विटी मार्केट के प्रति लोगों का गहरा विश्वास दर्शाता है।
पोर्टफोलियो का रिव्यू कब करें?
मार्केट की हलचल और शॉर्ट-टर्म उतार-चढ़ाव को देखकर घबराने के बजाय, अनुशासन के साथ निवेश करना जरूरी है। यूनियन एसेट मैनेजमेंट कंपनी के सीईओ राजकमल तिवारी का कहना है कि अक्सर निवेशक केवल तिमाही नतीजों (Quarterly returns) को देखकर चिंतित हो जाते हैं। लेकिन सच यह है कि शॉर्ट-टर्म वोलेटिलिटी मार्केट साइकिल का हिस्सा है। कई बार फंड की परफॉर्मेंस का खराब दिखना केवल उसके 'इन्वेस्टमेंट स्टाइल' (जैसे वैल्यू या ग्रोथ) के बाजार के रुझान से मेल न खाने के कारण होता है।
पोर्टफोलियो चेक करने का सही तरीका
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अपने पोर्टफोलियो का रिव्यू हर 3 से 5 साल में करना सबसे बेहतर रहता है। इस अवधि में आप यह समझ सकते हैं कि क्या फंड मैनेजर अपने उद्देश्य पर टिके हैं और क्या फंड ने अपने बेंचमार्क के मुकाबले प्रदर्शन किया है। अगर कोई स्कीम लंबे समय से बेंचमार्क को बीट नहीं कर पा रही है या फंड मैनेजर बार-बार बदल रहे हैं, तो ही बदलाव के बारे में सोचना चाहिए।
रिस्क मैनेजमेंट और रीबैलेंसिंग
जैसे-जैसे आपका फाइनेंशियल गोल करीब आता है, रिस्क मैनेजमेंट जरूरी हो जाता है। अगर आप अपने लक्ष्य के करीब हैं, तो स्मॉल-कैप या मिड-कैप में भारी रिस्क लेने के बजाय एसेट रीबैलेंसिंग करना समझदारी है। कुल मिलाकर, वेल्थ क्रिएशन का मंत्र 'निरंतरता' है। अपने निवेश को केवल हालिया रिटर्न के आधार पर न परखें, बल्कि उसे अपने रिस्क टॉलरेंस और टाइमलाइन के साथ एलाइन रखें।
