एक्टिव फंड्स की पकड़ ढीली, पैसिव की ओर बढ़ा रुझान
एक्टिवली मैनेज्ड इक्विटी म्यूचुअल फंड्स की बाजार हिस्सेदारी लगातार कम हो रही है। यह ट्रेंड पिछले कुछ सालों से दिख रहा था, लेकिन FY26 में इसने पहला बड़ा नकारात्मक मोड़ लिया है। इस बदलाव का मुख्य कारण एक्टिव और पैसिव फंड्स के बीच लागत का बड़ा अंतर है। एक्टिव फंड्स में आमतौर पर 1% से 2.5% तक का एक्सपेंस रेश्यो (औसतन 1.5%) लगता है, जबकि पैसिव फंड्स बहुत सस्ते होते हैं, जिनकी लागत 0.05% से 0.5% के बीच होती है। मिसाल के तौर पर, निफ्टी 50 को ट्रैक करने वाले इंडेक्स फंड्स पर केवल 0.2% से 0.3% ही खर्च आता है। डेटा बताता है कि 65-66% बड़े कैप वाले एक्टिव फंड्स अपने बेंचमार्क से बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं, ऐसे में निवेशक कम लागत वाले पैसिव विकल्पों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। कुछ साल पहले जहां पैसिव फंड्स की हिस्सेदारी 3% से भी कम थी, वहीं अब यह कुल म्यूचुअल फंड एसेट्स का लगभग 17% से 19% हो चुकी है।
गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ में रिकॉर्ड निवेश
सिर्फ पैसिव फंड ही नहीं, गोल्ड और सिल्वर एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETFs) भी निवेशकों के बीच रिकॉर्डतोड़ लोकप्रिय हुए हैं। जनवरी 2026 में, गोल्ड ईटीएफ में शुद्ध निवेश ₹24,040 करोड़ के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया, जो उस महीने इक्विटी म्यूचुअल फंड निवेश से भी कहीं ज्यादा था। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, महंगाई की चिंताएं, अमेरिकी डॉलर में उतार-चढ़ाव और ब्याज दरों के अनुमानों जैसे कारणों ने सोने को एक सुरक्षित निवेश (safe haven) के रूप में और आकर्षक बना दिया है। हालांकि मार्च 2026 के मध्य में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना के संकेतों के बाद सोने में 10% और चांदी में 15% से अधिक की गिरावट आई, लेकिन फिर भी मुद्रा और बाजार के जोखिमों से बचाव के लिए इन धातुओं में निवेशकों की दिलचस्पी बनी हुई है।
एसआईपी (SIP) दे रहा एक्टिव फंड्स को सहारा
एक्टिव इक्विटी फंड्स की कुल बाजार हिस्सेदारी भले ही गिरी हो, लेकिन FY26 में उनके एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) में 8.6% की वृद्धि हुई। हालांकि, इस ग्रोथ का बड़ा श्रेय सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए आने वाले निवेश को जाता है, जो एक्टिव इक्विटी स्कीम्स में आने वाले कुल एसेट्स का लगभग 80% है। FY26 में एसआईपी का कुल निवेश ₹3.5 ट्रिलियन तक पहुंच गया, जो FY25 के ₹2.9 ट्रिलियन से काफी ज्यादा है। एकमुश्त (lump-sum) निवेश में कमजोरी और सीमित मार्केट-बेस्ड गेन्स के साथ एसआईपी पर यह भारी निर्भरता एक्टिव इक्विटी फंड्स को संभावित जोखिमों की ओर इशारा करती है। यह दिखाता है कि इनकी ग्रोथ प्रदर्शन की मजबूत पकड़ के बजाय स्थापित निवेशक आदतों पर ज्यादा टिकी है।
रेगुलेटरी बदलाव और इंडस्ट्री में हलचल
भारतीय म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री बड़े संरचनात्मक बदलावों से गुजर रही है। पिछले पांच सालों में पैसिव फंड्स की एसेट्स लगभग सात गुना बढ़ी हैं, जो पैसिव निवेश के लिए एक निरंतर विस्तार का दौर दिखा रहा है। इन बदलावों को पारदर्शिता बढ़ाने और निवेशकों की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बनाए गए रेगुलेटरी अपडेट्स और बढ़ा रहे हैं। SEBI के नए नियम, जो 1 अप्रैल, 2026 से लागू होंगे, एक संशोधित एक्सपेंस फ्रेमवर्क पेश करेंगे। इसमें बेस एक्सपेंस रेश्यो (BER) की स्पष्ट परिभाषाएं और संभावित परफॉरमेंस-लिंक्ड फीस शामिल हैं, जो एक्टिव फंड मैनेजमेंट की लागतों पर और दबाव डाल सकती हैं। इसके अलावा, AMFI द्वारा नियमित स्टॉक री-क्लासिफिकेशन्स भी फंड फ्लो को प्रभावित कर सकते हैं।
एक्टिव फंड्स के सामने चुनौतियां
एक्टिव इक्विटी फंड्स के लिए आगे का रास्ता थोड़ा चुनौतीपूर्ण लग रहा है। प्रमुख मार्केट इंडेक्स में पैसिव फंड्स का बढ़ता दबदबा प्राइस डिस्कवरी में संभावित विकृतियों (distortions) और बाजार में अत्यधिक भीड़ (overcrowding) के कारण मंदी के दौरान नुकसान को बढ़ाने की चिंता पैदा करता है। पैसिव फंड्स का निरंतर लागत लाभ एक्टिव फंड्स की फीस को नीचे धकेल रहा है, जिससे एक्टिव मैनेजर्स को अपनी अधिक फीस को सही ठहराने के लिए बेहतर रिटर्न (अल्फा) जेनरेट करना होगा। हालांकि, ऐतिहासिक डेटा बताता है कि कई एक्टिव फंड्स, खासकर लार्ज-कैप सेगमेंट में, समय के साथ अपने बेंचमार्क को आउटपरफॉर्म करने में विफल रहे हैं। इसका मतलब है कि कई निवेशक औसत या औसत से कम बाजार रिटर्न के लिए अधिक शुल्क दे रहे हैं। एसआईपी पर निर्भरता यह भी बताती है कि एक्टिव फंड्स के प्रदर्शन में मजबूत विश्वास की कमी हो सकती है, जिससे यह सेगमेंट इस इनफ्लो स्रोत में किसी भी बदलाव के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
भविष्य का नज़रिया: पैसिव कोर, एक्टिव निश (Niche)
बड़े मार्केट इंडेक्स में पैसिव फंड्स का दबदबा जारी रहने की उम्मीद है। म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री के अधिक खंडित (segmented) होने की संभावना है, जिसमें कम लागत वाले पैसिव विकल्प अधिकांश निवेशकों के पोर्टफोलियो का मुख्य हिस्सा बनेंगे। एक्टिव रणनीतियों का उपयोग विशेष क्षेत्रों या निश (niche) क्षेत्रों में अधिक होने की संभावना है, जहां अल्फा जेनरेट करना अभी भी संभव है और उच्च फीस को उचित ठहराता है। नतीजतन, कई निवेशक एक संतुलित दृष्टिकोण अपना रहे हैं, जिसमें वे लागत लाभ और स्थिरता के लिए पैसिव फंड्स को चुन रहे हैं और साथ ही चुनिंदा एक्टिव रणनीतियों से विकास की संभावना का लाभ उठा रहे हैं। यह उन्हें बाजार की अस्थिरता को प्रबंधित करने और अपने दीर्घकालिक लक्ष्यों की ओर काम करने में मदद करता है। मौजूदा आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच विविधीकरण (diversification) और हेजिंग टूल की तलाश करने वाले निवेशकों के लिए गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ की मांग भी बनी रह सकती है।
