ग्लोबल मार्केट से मिले मिले-जुले संकेतों और चीन की इकोनॉमी में सुस्ती की खबरों के बीच, भारतीय शेयर बाज़ार (Indian Equity Markets) में निवेशकों की सतर्कता बढ़ी हुई दिखी। खास तौर पर जनवरी 2026 में, फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) की बिकवाली (Selling) जारी रही, जबकि डोमेस्टिक म्यूचुअल फंड्स (Mutual Funds) में भी इनफ्लो (Inflow) में कमी आई। इसकी बड़ी वजहें भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं और भारतीय कंपनियों का महंगा वैल्यूएशन (Valuation) रहीं, जिसने निवेशकों को दूसरे इमर्जिंग मार्केट्स (Emerging Markets) की ओर आकर्षित किया।
बाज़ार से क्यों भागा पैसा?
आंकड़े बताते हैं कि फाइनेंशियल ईयर 2026 की शुरुआत में, यानी जनवरी 2026 में, भारतीय इक्विटी म्यूचुअल फंड्स (Equity Mutual Funds) में आने वाला पैसा 14.35% घटकर ₹240.29 बिलियन (लगभग $2.65 बिलियन) रह गया। यह लगातार दूसरे महीने की गिरावट थी। इसी दौरान, फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) ने भारतीय शेयर बाज़ार से करीब $3.95 बिलियन की निकासी की। यह पैसा खासकर BFSI, कंज्यूमर गुड्स और ऑटोमोबाइल जैसे सेक्टर्स से निकाला गया। यह स्थिति इमर्जिंग मार्केट्स (EM) के उलट थी, जहां ईटीएफ (ETFs) में भारी इनफ्लो देखा गया। उदाहरण के लिए, डाइवर्सिफाइड इमर्जिंग-मार्केट ईटीएफ (Diversified Emerging-Market ETFs) ने जनवरी 2026 में रिकॉर्ड $19 बिलियन और नॉन-यूएस इक्विटी ईटीएफ (Non-US Equity ETFs) ने $60 बिलियन जुटाए। इससे पता चलता है कि जहां बाकी दुनिया का पैसा जोखिम भरे एसेट्स (Riskier Assets) में जा रहा था, वहीं भारत इससे अछूता रहा।
महंगा वैल्यूएशन और जियो-पॉलिटिक्स का डबल अटैक
इसका एक बड़ा कारण भारतीय शेयरों का महंगा होना है। भारत का P/E रेश्यो (Price-to-Earnings Ratio) करीब 23.13-23.87 के आसपास बना हुआ है। ऐतिहासिक तौर पर यह ठीक लग सकता है, लेकिन इमर्जिंग मार्केट्स के औसत P/E रेश्यो (जो आमतौर पर 12-14x के बीच रहता है) की तुलना में यह काफी ज्यादा है। ऐसे में, ग्लोबल अनिश्चितताओं के माहौल में निवेशकों के लिए यह कम आकर्षक लग रहा है।
निवेशकों की झिझक की एक और अहम वजह जटिल भू-राजनीतिक माहौल है। अमेरिका की वेनेज़ुएला में सैन्य कार्रवाइयां, ईरान में अस्थिरता और रूस से तेल के आयात पर अमेरिकी टैरिफ (Tariff) की आशंकाओं ने बाज़ार पर दबाव बनाया। इन चिंताओं के साथ-साथ भारतीय रुपये (Indian Rupee) का कमजोर होना, जो लगभग ₹92 प्रति डॉलर तक पहुंच गया था, विदेशी निवेशकों को और अधिक जोखिम-विरोधी (Risk-Averse) बना रहा था।
डोमेस्टिक इकोनॉमी स्थिर, पर ग्लोबल फैक्टर हावी
हालांकि, घरेलू स्तर पर इकोनॉमिक तस्वीर काफी हद तक स्थिर बनी हुई है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने फरवरी 2026 में अपनी रेपो रेट (Repo Rate) को 5.25% पर अपरिवर्तित रखा और न्यूट्रल (Neutral) स्टैंड बनाए रखा। RBI ने फाइनेंशियल ईयर 2025/26 के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान 7.4% और महंगाई दर (Inflation) का अनुमान 2.1% लगाया है। यह स्थिरता बाज़ार की भावनाओं के विपरीत थी, जो बाहरी जोखिमों और महंगे वैल्यूएशन से प्रभावित थी।
बाज़ार में भारी बिकवाली और एफपीआई का भरोसा
जनवरी 2026 में बिकवाली का दबाव इतना ज़्यादा था कि निफ्टी 500 (Nifty 500) के लगभग 70% स्टॉक्स महीने के मध्य तक गिरावट में थे। यह पिछले पांच सालों में जनवरी की सबसे खराब शुरुआत में से एक थी। FPIs की लगातार बिकवाली 2025 से जारी है, जब उन्होंने कुल $18.8 बिलियन की नेट सेलिंग की थी। यह दिखाता है कि नज़दीकी अवधि में भारतीय इक्विटी प्रदर्शन को लेकर उनमें फंडामेंटल भरोसा कम है। डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) ने कुछ हद तक इस बिकवाली को संभाला, लेकिन वे लगातार विदेशी पूंजी के भारी बहिर्वाह (Outflow) को हमेशा के लिए नहीं रोक सकते।
इसके अलावा, इमर्जिंग मार्केट के साथियों की तुलना में भारत का वैल्यूएशन प्रीमियम (Valuation Premium), कम रिटर्न के बावजूद, एक बड़ा जोखिम प्रस्तुत करता है। उदाहरण के लिए, 2025 में MSCI इंडिया इंडेक्स (MSCI India Index) ने USD के संदर्भ में सिर्फ 4.2% का मामूली रिटर्न दिया, जो MSCI इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स (MSCI Emerging Markets Index) के 34.3% के मुकाबले काफी कम था। इसने भारत को ग्लोबल ग्रोथ ट्रेंड्स से अलग-थलग कर दिया।
एक और बड़ा फैक्टर US-India ट्रेड डील (Trade Deal) से जुड़ा है, जो टैरिफ राहत के लिए ज़रूरी है। यह एक महत्वपूर्ण, अनसुलझा मुद्दा है, जो एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर्स के लिए रेगुलेटरी अनिश्चितता (Regulatory Uncertainty) पैदा कर रहा है और विदेशी निवेश को और हतोत्साहित कर रहा है। स्मॉल और मिड-कैप सेगमेंट्स (Small and Mid-Cap Segments) का कमजोर प्रदर्शन, जो बड़े इंडेक्स की तुलना में ज़्यादा गिरा, बाज़ार के आत्मविश्वास में व्यापक कमी का संकेत देता है।
आगे क्या? बाज़ार की चाल और विश्लेषकों की राय
हालांकि, जनवरी के इस भारी बिकवाली के बाद फरवरी में तस्वीर थोड़ी बदली। फरवरी के पहले हफ्ते में FPIs नेट खरीदार (Net Buyers) बन गए और उन्होंने ₹8,100 करोड़ से ज़्यादा का निवेश किया। इसका श्रेय ग्लोबल रिस्क सेंटिमेंट (Global Risk Sentiment) में आई नरमी और US ट्रेड डील में प्रगति को जाता है। लेकिन, कोटक महिंद्रा एएमसी (Kotak Mahindra AMC) के विश्लेषकों (Analysts) का मानना है कि FIIs का आउटफ्लो जारी रह सकता है। उनका कहना है कि यूनियन बजट (Union Budget) में महत्वपूर्ण टैक्स राहत के बिना इस ट्रेंड को पलटना मुश्किल होगा। वे स्मॉल कैप की तुलना में बड़े और मिड-कैप सेगमेंट्स (Large and Mid-Cap Segments) को बेहतर रिस्क-रिवॉर्ड प्रोफाइल के कारण प्राथमिकता दे रहे हैं।
बाज़ार में फिलहाल उतार-चढ़ाव (Volatility) बने रहने की उम्मीद है, जिसमें स्टॉक-विशिष्ट (Stock-Specific) मूव्स हावी रहेंगे। निवेशक यूनियन बजट, भू-राजनीतिक और व्यापार वार्ताओं (Trade Negotiations) से स्पष्टता का इंतज़ार कर रहे हैं। जबकि डोमेस्टिक फंडामेंटल्स (Domestic Fundamentals) एक हद तक मजबूती दे रहे हैं, भारतीय इक्विटी के लिए नज़दीकी अवधि का आउटलुक सतर्कता भरा है, जो मुख्य रूप से बाहरी कारकों और वैल्यूएशन एडजस्टमेंट से प्रभावित रहेगा।