बाजार में उथल-पुथल के बावजूद इक्विटी फंड्स में रिकॉर्ड पैसा
मार्च 2026 में, भारतीय इक्विटी म्यूचुअल फंड्स (Equity Mutual Funds) ने जुलाई 2025 के बाद से अब तक का सबसे बड़ा इनफ्लो देखा, जो ₹40,450 करोड़ रहा। यह तेजी तब आई जब पूरे म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में ₹2.39 लाख करोड़ का नेट आउटफ्लो देखा गया, जिसका मुख्य कारण ₹2.94 लाख करोड़ का डेट फंड्स (Debt Funds) से निकला पैसा था। बता दें कि फिस्कल क्वार्टर के अंत में कॉर्पोरेट लिक्विडिटी मैनेजमेंट के चलते यह एक आम चलन है। वहीं, बाजार में भी जियोपॉलिटिकल तनावों और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण बड़ी गिरावट आई, जिसमें बेंचमार्क सेंसेक्स (Sensex) इंडेक्स 11% से अधिक लुढ़क गया। इस गिरावट के चलते इक्विटी म्यूचुअल फंड्स के टोटल एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) में भी कमी आई और यह ₹35.6 लाख करोड़ से घटकर ₹32 लाख करोड़ से नीचे चला गया। इन चुनौतियों के बावजूद, यह लगातार 61वां महीना था जब इक्विटी फंड्स में पैसा आता रहा।
SIPs ने बनाया नया कीर्तिमान, सेक्टर्स में दिखी शिफ्टिंग
सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान्स (SIPs) इस रिकॉर्ड इनफ्लो के पीछे एक बड़ा कारण रहे। मार्च में SIPs के जरिए मासिक योगदान ₹32,087 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो रिटेल निवेशकों के निरंतर अनुशासन को दर्शाता है। बाजार की अस्थिरता के बीच भी यह लगातार SIP ग्रोथ निवेशकों की प्रतिबद्धता को उजागर करती है। इक्विटी कैटेगरीज़ की बात करें तो, फ्लेक्सी-कैप फंड्स (Flexi-cap funds) ₹10,054 करोड़ के इनफ्लो के साथ सबसे आगे रहे। इसके बाद मिड-कैप फंड्स (Mid-cap funds) में ₹6,063 करोड़ और स्मॉल-कैप फंड्स (Small-cap funds) में ₹6,263 करोड़ का इनफ्लो देखा गया। बाजार में आई गिरावट के दौरान इन सेगमेंट्स में इनफ्लो तेजी से बढ़ा, जो बताता है कि निवेशक करेक्शन को सस्ते दामों पर एसेट्स खरीदने के अवसर के तौर पर देख रहे हैं। वहीं, गोल्ड ईटीएफ (Gold ETFs) में इनफ्लो में काफी कमी आई, जो महीने-दर-महीने 57% घटकर ₹2,266 करोड़ रहा। यह शायद सेफ-हेवन एसेट्स से इक्विटी की ओर एक रणनीतिक बदलाव का संकेत दे रहा है। 'अदर ईटीएफ' (Other ETFs) में इनफ्लो चार गुना हो गया, जो पैसिव इक्विटी इन्वेस्टमेंट की बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है।
इनफ्लो के बीच कुछ चिंताजनक संकेत
हालांकि इक्विटी इनफ्लो मजबूत रहा, लेकिन कुछ ऐसे कारक हैं जिन पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है। डेट फंड्स से भारी आउटफ्लो, भले ही काफी हद तक मौसमी हो, यह दिखाता है कि इंस्टीट्यूशनल लिक्विडिटी एडजस्टमेंट का कितना बड़ा असर पड़ सकता है। एक खास चिंता SIP रोकने (stoppage) के ऊंचे अनुपात में है, जो मार्च में 76% से 100% तक रहा। यह बताता है कि बड़ी संख्या में मौजूदा SIPs बंद हो रही हैं या मैच्योर हो रही हैं, जिससे कुछ निवेशक फायदा बुक करने या ग्लोबल अनिश्चितता के बीच निवेश रोकने का फैसला कर रहे हैं। फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) ने भी मार्च में ₹1.14 लाख करोड़ की रिकॉर्ड नेट सेलिंग जारी रखी, जो बाजार सेंटिमेंट पर और दबाव डाल सकती है। नए निवेश के बावजूद इक्विटी AUM में आई कुल गिरावट, इस बात की याद दिलाती है कि मार्क-टू-मार्केट नुकसान नए पैसे से होने वाले लाभ को आंशिक रूप से ऑफसेट कर रहा है।
आगे का रास्ता: डोमेस्टिक निवेशक मार्केट को सहारा दे रहे
विश्लेषकों का मानना है कि फ्लेक्सी-कैप, मिड-कैप और स्मॉल-कैप फंड्स में लगातार हो रहा इक्विटी इनफ्लो, भारतीय निवेशकों की बढ़ती परिपक्वता और देश के आर्थिक विकास में उनके दीर्घकालिक विश्वास को दर्शाता है। 'गिरावट में खरीदो' (buy the dip) की रणनीति और गोल्ड ईटीएफ से इक्विटी की ओर शिफ्ट, कैपिटल के रणनीतिक पुन: आवंटन का संकेत देते हैं। हालांकि, लगातार बने हुए जियोपॉलिटिकल जोखिम और कच्चे तेल की ऊंच्��ी कीमतें ऐसे महत्वपूर्ण कारक हैं जो नई अस्थिरता को ट्रिगर कर सकते हैं और निवेशकों के सेंटिमेंट को प्रभावित कर सकते हैं। डोमेस्टिक निवेशक तेजी से मार्केट में एक 'एंकर' की भूमिका निभा रहे हैं, जो बिकवाली के दबाव को सोख रहे हैं। यह भूमिका आने वाले महीनों में परखी जाएगी। हाल की उछाल के बाद SIP एक्टिविटी सामान्य हो रही है, लेकिन लम्प-सम इन्वेस्टमेंट अभी भी मजबूत बने हुए हैं।