यह ज़बरदस्त बढ़ोतरी भारतीय निवेशकों के व्यवहार में एक बड़े बदलाव का संकेत है। अब निवेशक पारंपरिक, फिक्स्ड स्ट्रैटेजी से हटकर ज्यादा फ्लेक्सिबल और ग्रोथ-ओरिएंटेड फंड्स की ओर रुख कर रहे हैं।
फ्लेक्सी-कैप फंड्स ने मारी बाजी
खासतौर पर, फ्लेक्सी-कैप फंड्स (Flexi-Cap Funds) ने सबको पीछे छोड़ दिया। इन फंड्स ने 25.10% की शानदार ग्रोथ दिखाते हुए लगभग ₹5.28 लाख करोड़ का AUM हासिल किया। मैनेजर्स की फ्लेक्सिबिलिटी के कारण ये फंड्स मार्केट कैप के बीच कहीं भी पैसा लगा सकते हैं। इसके अलावा, मिड-कैप फंड्स में 22.74% और स्मॉल-कैप फंड्स में 20.33% की वृद्धि देखी गई। वहीं, लार्ज-कैप फंड्स की ग्रोथ 11.04% पर ही सिमट गई, जो साफ दिखाता है कि निवेशक अब बड़ी कंपनियों के मुकाबले ग्रोथ वाले सेगमेंट में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं।
इंडस्ट्री की ग्रोथ और SIP का रिकॉर्ड
कुल मिलाकर, म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री का AUM मार्च 2026 तक ₹73.73 लाख करोड़ तक पहुंच गया, जो पिछले साल से 12.2% ज्यादा है। हालांकि, यह ग्रोथ रेट पिछले दो सालों (FY25 और FY24) की तुलना में थोड़ी धीमी है। लेकिन, बाजार में उथल-पुथल और जियोपॉलिटिकल अनिश्चितताओं के बावजूद, रिटेल पार्टिसिपेशन मजबूत बना रहा। खास तौर पर, सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए आने वाला पैसा रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा, मार्च में यह ₹32,087 करोड़ रहा। फ्लेक्सी-कैप फंड्स में भी मार्च में रिकॉर्ड ₹10,054 करोड़ का इनफ्लो देखा गया, जो अनिश्चितता में भी फंड मैनेजर की फ्लेक्सिबिलिटी पर निवेशकों का भरोसा दिखाता है।
वैल्यूएशन को लेकर चिंताएं
लेकिन इस चमकती तस्वीर के पीछे कुछ चिंताएं भी छिपी हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने जुलाई 2025 में ही भारतीय स्टॉक्स, खासकर स्मॉल और मिड-कैप्स में ओवरवैल्यूएशन (overvaluation) के खतरे के प्रति आगाह किया था। RBI के मुताबिक, मौजूदा वैल्यूएशन को सही ठहराने के लिए कंपनियों को 28-30% से ज्यादा की अर्निंग ग्रोथ दिखानी पड़ सकती है। यह चिंता तब और बढ़ जाती है जब निवेशक इन हाई-ग्रोथ सेगमेंट्स की ओर भाग रहे हैं। सेक्टोरल और थीमेटिक फंड्स (Sectoral and Thematic Funds) में कंसंट्रेशन रिस्क (concentration risk) और वोलेटिलिटी (volatility) का खतरा भी रहता है। एनालिस्ट्स का मानना है कि ये फंड्स पोर्टफोलियो का हिस्सा तो हो सकते हैं, पर मुख्य निवेश नहीं।
आगे क्या?
भविष्य की बात करें तो, फ्लेक्सी-कैप और मिड-कैप फंड्स की बढ़ती पॉपुलैरिटी से पता चलता है कि निवेशक अभी भी डायनामिक एसेट एलोकेशन (dynamic asset allocation) और ग्रोथ को प्राथमिकता देंगे। एनालिस्ट्स को उम्मीद है कि SIP के जरिए रिटेल इनफ्लो मजबूत बना रहेगा। हालांकि, अब निवेशकों और फंड मैनेजर्स का फोकस स्ट्रेच्ड वैल्यूएशन्स के बीच असली लॉन्ग-टर्म वैल्यू ढूंढने पर रहेगा। मैनेजर्स की फ्लेक्सिबिलिटी और रिस्क मैनेजमेंट का संतुलन ही भविष्य में उनके प्रदर्शन को तय करेगा।