यील्ड कर्व (Yield Curve) में तेज़ी की उम्मीद
Invesco Mutual Fund के फिक्स्ड इनकम हेड, विकास गर्ग का अनुमान है कि भारत का यील्ड कर्व (Yield Curve) और तेज़ होगा। अगले कुछ महीनों में 10-साल के बेंचमार्क यील्ड के 6.60% से 6.80% के दायरे में रहने की उम्मीद है। यह अनुमान इस धारणा पर आधारित है कि बाज़ार ने फिस्कल सप्लाई (Fiscal Supply) की स्पष्टता और रेट-कट साइकिल (Rate-cut cycle) के अंत को पूरी तरह से समझ लिया है। लिक्विडिटी (Liquidity) और डिमांड के कारण कर्व का शॉर्ट एंड (short end) घटने की उम्मीद है, जबकि लॉन्ग-एंड (long end) यील्ड पर सप्लाई का दबाव बना रहेगा।
यह घरेलू अनुमान अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड (4.08%) और यूरो ज़ोन बंड्स (2.74%) जैसे ग्लोबल बाज़ारों से एक अलग तस्वीर पेश करता है। हालांकि, भारतीय सरकारी बॉन्ड अभी भी डेवलप्ड मार्केट्स की तुलना में 3-4% ज़्यादा यील्ड (Yield) दे रहे हैं, जो इसे आकर्षक बनाता है।
फिस्कल दबाव और उधारी का बोझ
भारतीय बॉन्ड बाज़ार अभूतपूर्व फिस्कल सप्लाई (Fiscal Supply) चुनौती का सामना कर रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2027 (FY27) में केंद्र और राज्य सरकारों की कुल सॉवरेन बॉरोइंग (Sovereign Borrowing) अनुमानित ₹30.5 ट्रिलियन तक पहुँच सकती है। पिछले साल की तुलना में यह उधारी की भारी मात्रा घरेलू निवेशकों के लिए एक बड़ी अवशोषण (absorption) की चुनौती पेश करती है। अनुमान है कि अकेले केंद्र सरकार ₹16.5 ट्रिलियन उधार ले सकती है, जबकि राज्य लगभग ₹14 ट्रिलियन जुटा सकते हैं। इस भारी सप्लाई को ऊंचे यील्ड का मुख्य कारण माना जा रहा है, जिसके चलते बेंचमार्क 10-साल के बॉन्ड यील्ड ने हाल ही में 6.70% का स्तर छुआ था।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) इस डिमांड-सप्लाई असंतुलन को प्रबंधित करने में अहम भूमिका निभाएगा। FY27 में लिक्विडिटी (Liquidity) बढ़ाने और बॉरोइंग कॉस्ट (Borrowing Costs) को नियंत्रित करने के लिए RBI द्वारा लगभग ₹5 लाख करोड़ के ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMOs) की उम्मीद है।
मॉनेटरी पॉलिसी ट्रांसमिशन और ग्लोबल फैक्टर
बॉन्ड बाज़ार में मॉनेटरी पॉलिसी ट्रांसमिशन (Monetary policy transmission) एक चिंता का विषय बना हुआ है। पिछले रेट कट के बावजूद, एक साल के सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (Certificate of Deposit) की दरें 7% पर बनी हुई हैं, जो बाज़ार में और एडजस्टमेंट की ज़रूरत को दर्शाता है। ग्लोबल स्तर पर, US फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) रेट कट के संकेत दे रहा है, जबकि यूरोपियन सेंट्रल बैंक (European Central Bank) स्थिर बना हुआ है, जो ग्लोबल ब्याज दर की उम्मीदों का एक जटिल खेल बना रहा है।
इंडियन रुपया (Indian Rupee) में भी अस्थिरता बनी हुई है, जो डॉलर के मुकाबले लगभग ₹90.70 पर कारोबार कर रहा है। 2026 के लिए रुपए की चाल ₹87 से ₹94 तक अनुमानित है, जो ग्लोबल रिस्क सेंटीमेंट और ट्रेड पॉलिसी की अनिश्चितताओं से प्रभावित होगी। हालांकि भारतीय बॉन्ड का ग्लोबल यील्ड से कोरिलेशन ऐतिहासिक रूप से कम रहा है, लेकिन यह अब कमज़ोर पड़ रहा है, जिससे बाज़ार इंटरनेशनल कैपिटल फ्लोज़ के प्रति अधिक संवेदनशील हो गया है।
स्ट्रक्चरल अवसर और जोखिम
इस चुनौतीपूर्ण माहौल के बीच, कुछ खास अवसर भी दिख रहे हैं। RBI के OMOs और डिमांड को देखते हुए 5-10 साल के G-Sec कर्व को आकर्षक माना जा रहा है। 1-4 साल के कॉर्पोरेट बॉन्ड (Corporate Bonds) भी सरकारी सिक्योरिटीज की तुलना में अच्छे स्प्रेड (spreads) की पेशकश कर रहे हैं। जोखिम से बचने वाले निवेशकों के लिए मनी मार्केट (Money Market) या लो-ड्यूरेशन फंड (Low-duration funds) उपयुक्त हो सकते हैं।
हालांकि, 'फॉरेंसिक बेयर केस' (forensic bear case) महत्वपूर्ण जोखिमों को भी उजागर करता है। भारी मात्रा में डेट सप्लाई (debt supply) यील्ड को लगातार ऊपर की ओर धकेल सकती है, जिससे प्राइवेट इन्वेस्टमेंट (Private Investment) में कमी आ सकती है और कॉर्पोरेशन्स के लिए बॉरोइंग कॉस्ट (Borrowing Costs) बढ़ सकती है। जबकि भारतीय बॉन्ड कई प्रतिस्पर्धियों की तुलना में ज़्यादा यील्ड देते हैं, उनका रिस्क प्रीमियम इन्फ्लेशन (Inflation) की अनिश्चितता और करेंसी वोलैटिलिटी (Currency Volatility) जैसे कारकों से बढ़ जाता है। पिछले अनुभव बताते हैं कि बढ़ती फिस्कल सप्लाई से यील्ड में अचानक तेज़ी आ सकती है, जैसा कि 2025 के अंत में राज्य की उधारी बढ़ने पर देखा गया था। RBI की लिक्विडिटी मैनेजमेंट (Liquidity Management) की प्रभावशीलता और ग्लोबल ट्रेड अनिश्चितताओं का समाधान इन जोखिमों को कम करने में महत्वपूर्ण होगा।