टैक्स बचाने वाले 'इनकम प्लस आर्बिट्राज' म्यूचुअल फंड्स का आकर्षण अब कम होता दिख रहा है। 2025 में जहां इन फंड्स में भारी निवेश आया था, वहीं 2026 में अब तक करीब ₹2,000 करोड़ का Outflow देखा गया है। निवेशक इन फंड्स की जटिल बनावट, डबल लेयर एक्सपेंस रेशियो और कम परफॉरमेंस को लेकर चिंतित हैं।
फंड्स में क्यों आ रहा है Outflow?
आम निवेशक अब 'इनकम प्लस आर्बिट्राज' (Income Plus Arbitrage) म्यूचुअल फंड्स से दूरी बना रहे हैं। 2025 में जहां इन फंड्स में लगभग ₹21,000 करोड़ का निवेश आया था, वहीं 31 जुलाई 2026 तक ₹2,000 करोड़ से ज्यादा की निकासी (Outflow) हो चुकी है। यह बदलाव निवेशकों के बीच इन नए और जटिल प्रोडक्ट्स में पैसा लगाने को लेकर बढ़ती हिचकिचाहट को दिखाता है।
टैक्स एफिशिएंसी का वादा, पर है कॉम्प्लेक्सिटी
इन फंड्स का मुख्य आकर्षण टैक्स बचाने की क्षमता रही है। ये फंड डेट इंस्ट्रूमेंट्स (Debt Instruments) और आर्बिट्राज (Arbitrage) के बीच निवेश बांटते हैं। आर्बिट्राज में कैश और फ्यूचर मार्केट के प्राइस डिफरेंस का फायदा उठाया जाता है। इस स्ट्रैटेजी से ये फंड्स इक्विटी की तरह कैपिटल गेन्स टैक्स (Capital Gains Tax) का लाभ उठाने की कोशिश करते हैं। इसका मतलब है कि अगर फंड को 24 महीने या उससे ज्यादा समय तक होल्ड किया जाए, तो मुनाफे पर सिर्फ 12.5% टैक्स लगता है, जो कि सामान्य डेट फंड्स पर लगने वाले टैक्स से काफी कम है।
डबल लेयर एक्सपेंस और कम रिटर्न
लेकिन, इन फंड्स की ऑपरेशनल जटिलताएं अब निवेशकों को परेशान कर रही हैं। कई स्कीमें 'फंड ऑफ फंड्स' (Fund of Funds - FoF) के तौर पर स्ट्रक्चर की गई हैं। इसका मतलब है कि यह फंड दूसरे अंडरलाइंग स्कीम्स (Underlying Schemes) में निवेश करता है। इस वजह से मैनेजमेंट फीस दो स्तरों पर लगती है - एक फंड लेवल पर और दूसरी अंडरलाइंग स्कीम लेवल पर। इसे 'डबल लेयर एक्सपेंस रेशियो' (Double Layer Expense Ratio) कहते हैं, जो फाइनल रिटर्न को कम कर देता है। इस वजह से ये फंड्स, सिंपल और कम लागत वाले मनी मार्केट फंड्स (Money Market Funds) या कॉर्पोरेट डेट फंड्स (Corporate Debt Funds) से बेहतर परफॉरमेंस नहीं दे पा रहे हैं।
परफॉरमेंस भी चिंता का सबब
बीते एक साल में, इन फंड्स ने औसतन 5.7% से 6.0% का रिटर्न दिया है, जो कि अक्सर सिंपल मनी मार्केट फंड्स और शॉर्ट-ड्यूरेशन डेट फंड्स से कम रहा है। जब निवेशक इन हाइब्रिड प्रोडक्ट्स के रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न (Risk-Adjusted Returns) की तुलना पारंपरिक फिक्स्ड-इनकम ऑप्शन्स (Fixed-Income Options) से करते हैं, तो टैक्स फायदे के लिए लगने वाली 24 महीने की होल्डिंग पीरियड की शर्त अक्सर भारी पड़ जाती है।
कन्फ्यूजन और भविष्य की राह
HDFC Mutual Fund और Sundaram Mutual Fund जैसे बड़े एसेट मैनेजर्स ने इस स्पेस में स्कीम्स लॉन्च की हैं, जिनकी कुल संख्या 22 हो चुकी है। लेकिन, 'एक्टिव' (Active) या 'ओमनी' (Omni) जैसे शब्दों की स्टैंडर्डाइज्ड परिभाषा न होने से कन्फ्यूजन बढ़ा है। आम निवेशक के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि उनका पैसा कहां जा रहा है।
आगे चलकर, निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या ये फंड्स अपने एक्सपेंस रेशियो को सही ठहराने लायक कंसिस्टेंट परफॉरमेंस दे पाते हैं। जो लोग इन प्रोडक्ट्स पर विचार कर रहे हैं, उन्हें अपने निवेश के होराइजन (Investment Horizon) का सावधानी से मूल्यांकन करना होगा, क्योंकि टैक्स फायदे 24 महीने की होल्डिंग पीरियड से जुड़े हैं।
