स्थिरता की ओर निवेशकों का झुकाव
जनवरी 2026 में हाइब्रिड और मल्टी-एसेट फंड्स में देखा गया यह ताबड़तोड़ निवेश, निवेशकों की रणनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत दे रहा है। यह साफ दिखाता है कि निवेशक अब पूरी तरह से इक्विटी पर दांव लगाने के बजाय अपने पोर्टफोलियो में विविधीकरण (Diversification) और स्थिरता को ज़्यादा अहमियत दे रहे हैं। कुल ₹13,200 करोड़ के इस बड़े इनफ्लो से यह बात साफ हो जाती है कि बाज़ार की मौजूदा अनिश्चितताओं, खासकर भू-राजनीतिक तनाव और अस्थिर इक्विटी बाज़ार को देखते हुए, निवेशक आक्रामक रिटर्न की चाहत से ज़्यादा पोर्टफोलियो की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं। मल्टी-एसेट फंडों का अकेले ₹10,000 करोड़ आकर्षित करना इस ट्रेंड को और पुख्ता करता है।
हाइब्रिड फंड्स का दम
हाइब्रिड और मल्टी-एसेट फंड्स को मिली यह लोकप्रियता सिर्फ जनवरी की बात नहीं है, बल्कि यह 2025 से चला आ रहा एक मज़बूत ट्रेंड है। इन फंडों ने पिछले साल यानी 2025 में, शुद्ध इक्विटी फंडों के मुकाबले शानदार प्रदर्शन किया था। उदाहरण के लिए, मल्टी-एसेट फंडों ने 2025 में करीब 16% का रिटर्न दिया, जो फ्लेक्सी-कैप फंडों के लगभग 3% के रिटर्न से कहीं बेहतर था। इस शानदार प्रदर्शन में सोने और चांदी की कीमतों में आई ज़बरदस्त उछाल का बड़ा हाथ रहा, जहां सोना 74.5% और चांदी 138% तक चढ़े। वहीं, एग्रेसिव हाइब्रिड फंडों ने भी इक्विटी जैसे रिटर्न के साथ कम अस्थिरता (Volatility) प्रदान की। इसकी तुलना में, मुख्य इक्विटी बाज़ार में इनफ्लो जनवरी 2026 में करीब 14% घटा, और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने 2025 में भू-राजनीतिक तनाव और व्यापार संबंधी चिंताओं के चलते भारतीय इक्विटी से ₹2.4 लाख करोड़ की बिकवाली की थी।
जोखिम भी हैं, पर...
हालांकि, हाइब्रिड और मल्टी-एसेट फंड्स की चमक के पीछे कुछ छिपे हुए जोखिम भी हैं। 2025 में इन फंडों का बेहतरीन प्रदर्शन काफी हद तक सोना और चांदी जैसी कमोडिटीज़ में आई भारी तेज़ी का नतीजा था। यह ज़रूरी नहीं कि यह तेज़ी भविष्य में भी जारी रहे। अगर कीमती धातुओं की कीमतें गिरती हैं, तो इन फंडों का प्रदर्शन शुद्ध इक्विटी फंडों के मुकाबले कमज़ोर पड़ सकता है। इसके अलावा, आर्बिट्राज फंडों की आकर्षण क्षमता स्प्रेड (Spreads) पर निर्भर करती है, जो फंड मैनेजरों के अनुसार, अब कुछ नरम पड़ गए हैं। यदि फंड के डेट (Debt) वाले हिस्से पर ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो रिटर्न पर असर पड़ सकता है। मल्टी-एसेट फंडों में विभिन्न एसेट क्लास के बीच सही संतुलन बनाना एक चुनौती होती है, और किसी बड़े भू-राजनीतिक झटके से सभी एसेट क्लास एक साथ प्रभावित हो सकते हैं, जिससे विविधीकरण का फायदा कम हो जाएगा।
आगे का रास्ता?
इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि निवेशकों का यह झुकाव, यानी जोखिम कम करने के लिए संतुलित और विविध पोर्टफोलियो की ओर बढ़ना, अभी जारी रहने की उम्मीद है। मल्टी-एसेट फंड्स को भविष्य में भी एक 'ऑल-वेदर' (All-weather) समाधान के तौर पर निवेशकों का ध्यान खींचने की संभावना है। यह दिखाता है कि बाज़ार अब केवल रिटर्न की दौड़ में नहीं, बल्कि पूंजी की सुरक्षा और पोर्टफोलियो की मजबूती को भी गंभीरता से ले रहा है।