हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (HNIs) पैसिव म्यूचुअल फंड में निवेश तेजी से बढ़ा रहे हैं। मार्च 2026 तक इनकी हिस्सेदारी तीन गुना बढ़कर **19.9%** हो गई है। वहीं, जुलाई 2026 तक इंडस्ट्री का कुल एसेट **₹15.15 लाख करोड़** पार कर गया है। निवेशक अब कम लागत और पारदर्शिता के कारण इंडेक्स फंड की ओर बढ़ रहे हैं।
HNI की बढ़ी पैसिव फंड में भागीदारी
आमिर निवेशक अब पैसिव इन्वेस्टमेंट व्हीकल्स में अपनी भागीदारी काफी बढ़ा रहे हैं। पिछले पांच सालों में, जहाँ इनकी हिस्सेदारी 6.6% थी, वहीं अब यह बढ़कर 19.9% हो गई है। AMFI-Crisil Intelligence Factbook 2026 के अनुसार, यह ट्रेंड निवेशकों के एक्टिव मैनेजमेंट से दूर जाने और ट्रांसपेरेंसी व कम लागत वाले विकल्पों को अपनाने का संकेत देता है।
पैसिव फंड इंडस्ट्री में तूफानी उछाल
एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETFs) और इंडेक्स फंड्स को मिलाकर बनी पैसिव फंड इंडस्ट्री ने गजब की ग्रोथ दिखाई है। जुलाई 2026 तक, इंडस्ट्री का कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) ₹15.15 लाख करोड़ तक पहुंच गया, जो कुल म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री का लगभग 18% है। जुलाई 2021 से अब तक AUM में 324% की जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है, जिसके पीछे मार्केट परफॉरमेंस और लगातार आ रहे इनफ्लोस का बड़ा हाथ है।
कॉर्पोरेट से HNI और रिटेल की ओर शिफ्ट
वैसे तो पहले कॉर्पोरेट इन्वेस्टर्स का इस सेगमेंट में दबदबा था, लेकिन मार्च 2026 तक उनकी हिस्सेदारी घटकर 69.6% रह गई, जो पांच साल पहले 78.4% थी। जैसे-जैसे कॉर्पोरेट्स का शेयर कम हुआ, HNI और रिटेल इन्वेस्टर्स की भागीदारी इस इंडस्ट्री के लिए नई जान फूंकने वाली साबित हुई। रिटेल निवेशकों ने खास तौर पर इंडेक्स फंड्स का रुख किया है, जो अब उनके कुल पैसिव फंड एलोकेशन का 55% है, जबकि फाइनेंशियल ईयर 2021 में यह आंकड़ा सिर्फ 11.5% था। आर्थिक अनिश्चितताओं से बचाव के लिए गोल्ड ईटीएफ (Gold ETF) में भी रिटेल पार्टिसिपेंट्स की दिलचस्पी बढ़ी है, जो उनके पैसिव पोर्टफोलियो का 14.9% हो गया है।
इनवेस्टर्स को इन जोखिमों पर भी देना होगा ध्यान
पैसिव फंड्स में इस भारी बढ़ोतरी के साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हैं। चूंकि ये फंड्स इंडेक्स को ट्रैक करते हैं, इसलिए मार्केट में गिरावट के समय इनमें कोई सुरक्षा नहीं मिलती और पोर्टफोलियो पूरी तरह से मार्केट की वोलैटिलिटी का शिकार हो सकता है। इसके अलावा, थीमैटिक और सेक्टोरल पैसिव फंड्स में तेजी से इजाफा पोर्टफोलियो कंसंट्रेशन का जोखिम पैदा करता है। अगर निवेशक उचित डाइवर्सिफिकेशन के बिना इन खास प्रोडक्ट्स पर ज्यादा निर्भर रहे, तो किसी खास सेक्टर में मंदी आने पर उनके रिटर्न पर असर पड़ सकता है। ईटीएफ (ETFs) में ट्रैकिंग एरर और लिक्विडिटी की समस्या भी हो सकती है, खासकर जब मार्केट में ज्यादा उतार-चढ़ाव हो।
रेगुलेटर्स की भी बढ़ी नज़र
पैसिव फंड्स की बढ़ती संख्या के साथ रेगुलेटर्स का ध्यान भी इस ओर गया है। SEBI फिलहाल हर कैटेगरी में पैसिव फंड्स की संख्या पर संभावित सीमाएं लागू करने पर विचार कर रहा है। इस रेगुलेटरी रिव्यू का मकसद मार्केट को व्यवस्थित करना और निवेशकों को समान प्रोडक्ट्स की अधिकता से होने वाली उलझन को कम करना है। 2026 तक, पैसिव फंड फोलियो की संख्या 5 करोड़ से ज्यादा हो गई है, जो रिटेल एडॉप्शन को दर्शाता है। निवेशकों को प्रोडक्ट लिमिट्स से जुड़ी भविष्य की रेगुलेटरी घोषणाओं पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि ये नियम एसेट मैनेजमेंट कंपनियों के लिए कॉम्पिटिटिव लैंडस्केप को बदल सकते हैं।
