'सेफ हेवन' की ओर बड़ा कदम
जनवरी 2026 भारतीय निवेशकों के लिए Gold ETFs की ओर एक बड़ी उड़ान का महीना साबित हुआ। इस दौरान, Gold ETFs में ₹24,040 करोड़ का शुद्ध निवेश आया, जो दिसंबर 2025 के मुकाबले दोगुना से भी ज़्यादा था। ख़ास बात यह है कि यह निवेश इक्विटी-ओरिएंटेड स्कीम्स में आए ₹24,028.59 करोड़ के निवेश से थोड़ा आगे निकल गया। यह ज़बरदस्त रश 'सेफ हेवन' यानी सुरक्षित निवेश की मांग को दर्शाता है, खासकर तब जब भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं का माहौल बना हुआ था।
इक्विटी में निवेश पर असर
वहीं दूसरी ओर, इक्विटी म्यूचुअल फंड्स में निवेश थोड़ा धीमा पड़ गया। इस महीने इक्विटी स्कीम्स में 14% की गिरावट के साथ ₹24,028 करोड़ का निवेश आया। यह लगातार दूसरा महीना था जब इक्विटी में निवेश कम हुआ। हालांकि, इक्विटी बाज़ार आम तौर पर मज़बूत बना रहा, जहाँ फरवरी 2026 की शुरुआत तक अमेरिकी शेयर 2% ऊपर थे और पिछले साल यूरोप व चीन के बाज़ार भी अच्छा प्रदर्शन कर चुके थे। इक्विटी में यह सावधानी और सोने की ओर यह तेज़ी, बाज़ार के जानकारों को सोचने पर मजबूर कर रही है कि कहीं निवेशक छुपे हुए और कम वैल्यू वाले शेयरों के अवसरों को अनदेखा तो नहीं कर रहे।
व्यवहारिक चिंताएं और बढ़ती कीमतें
विश्लेषकों का कहना है कि Gold ETFs में यह बड़ा निवेश, सोने की पहले से ही ऊँची कीमतों पर हो रहा है। 2025 में सोने ने कई रिकॉर्ड बनाए थे और 2026 में भी इसके और तेज़ी की उम्मीदें हैं। ऐसे में, यह चिंताएं बढ़ जाती हैं कि क्या निवेशक 'रिसेंसी बायस' (recency bias) या पिछले प्रदर्शन के आधार पर दौड़ रहे हैं, बजाय इसके कि वे भविष्य के रिटर्न का सही अंदाज़ा लगाएं। इतने बड़े निवेश से ऐसा लग रहा है कि कहीं निवेशक सोने की ऊँची वैल्यूएशन पर फंसे न रह जाएं, खासकर यदि बाज़ार की स्थितियाँ अचानक बदलती हैं।
जोखिम और संभावित नुकसान
जानकारों के अनुसार, 'सेफ हेवन' के नाम पर Gold ETFs में इतनी बड़ी रकम लगाना जोखिम भरा हो सकता है। जब बाज़ार पहले से ही ऐतिहासिक रूप से ऊँचे स्तर पर हो, तो भीड़ बढ़ने का खतरा रहता है। यदि भू-राजनीतिक तनाव कम हो जाते हैं, केंद्रीय बैंक अपनी सोने की खरीद कम कर देते हैं, या अमेरिकी डॉलर मज़बूत होता है, तो सोने की कीमतों पर बड़ा दबाव आ सकता है। सोने से आय नहीं होती और इसकी कीमतों में बड़ी उठापटक हो सकती है। सोने में भारी निवेश का मतलब यह भी हो सकता है कि बड़े-कैप शेयरों जैसे अन्य एसेट क्लास में बड़े मौके गंवाए जा रहे हों, जिनकी वैल्यूएशन ज़्यादा आकर्षक हो और जो लंबी अवधि में बेहतर ग्रोथ दे सकें। यह सब बाज़ार की घबराहट या भावनात्मक प्रतिक्रिया का नतीजा हो सकता है, न कि एक रणनीतिक निवेश का।
भविष्य का नज़रिया
आगे क्या? 2026 के लिए Gold Prices को लेकर विश्लेषकों का नज़रिया आम तौर पर सकारात्मक बना हुआ है, क्योंकि केंद्रीय बैंकों की खरीद और भू-राजनीतिक जोखिम अभी भी बने हुए हैं। हालांकि, कुछ विशेषज्ञ सावधानी बरतने की भी सलाह दे रहे हैं, उनका मानना है कि अगर सट्टेबाजी वाले निवेश कम हुए या आर्थिक हालात सुधरे तो सोने की कीमतों में गिरावट आ सकती है। इक्विटी बाज़ार का प्रदर्शन महंगाई के आंकड़ों, ब्याज दरों और कंपनियों के नतीजों पर निर्भर करेगा। कुछ विशेषज्ञ कुछ सेगमेंट्स में वैल्यूएशन को थोड़ा खिंचा हुआ मान रहे हैं, तो कुछ दोहरे अंकों की ग्रोथ की उम्मीद कर रहे हैं। आने वाले महीने बताएंगे कि निवेशकों की सोने में यह प्राथमिकता एक लंबी अवधि का बदलाव है या महज़ बाज़ार की उथल-पुथल पर एक अस्थायी प्रतिक्रिया।