क्यों पिछड़ रहे हैं भारतीय इंडेक्स?
इस वक्त भारतीय इंडेक्स और चुनिंदा विदेशी बाजारों के प्रदर्शन में बड़ा अंतर साफ दिख रहा है। पिछले बारह महीनों में घरेलू बेंचमार्क को जहां कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, वहीं निवेशकों का पैसा यूएस टेक्नोलॉजी कंपनियों और कुछ इमर्जिंग मार्केट फंड्स की ओर बह निकला है। यह मुख्य रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इंफ्रास्ट्रक्चर और पूर्वी एशियाई मैन्युफैक्चरिंग हब में आई तेजी के कारण है। प्रदर्शन में यह अंतर सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव है जो यह दिखाता है कि घरेलू निवेश तक सीमित रहने की अपनी सीमाएं हैं, खासकर जब बाजार में ठहराव हो।
इनफ्लो पर रोक का बड़ा कारण
इमर्जिंग मार्केट के फंड्स में 80% से ऊपर का रिटर्न मिलना अब मुश्किल होता जा रहा है। फंड मैनेजर्स ने नए निवेश (inflows) पर सख्त पाबंदी लगा दी है और ऐसे कई हाई-परफॉर्मिंग प्रोडक्ट्स को सिर्फ सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए ही निवेश की अनुमति है। इसका मतलब है कि ये फंड अपनी क्षमता की सीमा या विदेशी निवेश कोटे को लेकर रेगुलेटरी लिमिट तक पहुंच रहे हैं। जो निवेशक इस तेजी का फायदा उठाना चाहते हैं, उन्हें यह समझना होगा कि सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाले फंड्स अब सीमित हो गए हैं।
छिपे हुए रिस्क को समझें
ताइवान के बेंचमार्क जैसे इंडेक्स में 100% से ज्यादा की तेजी और नैस्डैक (Nasdaq) की मजबूत चाल के बावजूद, मौजूदा माहौल में कई छिपे हुए जोखिम हैं। सबसे बड़ी चिंता करंसी (currency) का उतार-चढ़ाव है। विदेशी फंड्स में निवेश करने वाले भारतीय निवेशक असल में दो दांव लगा रहे हैं: एक तो इक्विटी प्रदर्शन पर और दूसरा USD-INR एक्सचेंज रेट पर। अगर रुपये में मजबूती आती है, तो निवेशकों का नेट रिटर्न काफी कम हो सकता है, जो कि तेजी के दौर में अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। इसके अलावा, सेक्टर का कंसंट्रेशन (concentration) भी बहुत ज्यादा है। टेक्नोलॉजी स्टॉक्स में ज्यादा निवेश करने के कारण, ये फंड्स ब्याज दरों में बदलाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। एक डाइवर्सिफाइड इंडेक्स फंड के विपरीत, ये टॉप परफॉर्मर्स अपनी अधिकांश अल्फा (alpha) के लिए कुछ चुनिंदा बड़ी कंपनियों पर निर्भर हैं। अगर टेक्नोलॉजी स्टॉक्स का आकर्षण कम होता है, तो इन फंड्स में गिरावट घरेलू बाजार की तुलना में ज्यादा हो सकती है।
आगे की रणनीति
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि भले ही इंटरनेशनल डाइवर्सिफिकेशन (diversification) एक जरूरी हेज (hedge) बना रहे, लेकिन सीधे-सादे ओपन-एंडेड पैसिव फंड्स से अतिरिक्त रिटर्न कमाने का दौर खत्म हो रहा है। भविष्य में अल्फा के लिए ज्यादा स्पेशलाइज्ड, एक्टिव मैनेजमेंट की जरूरत होगी जो विदेशी संपत्ति अधिग्रहण पर रेगुलेटरी बाधाओं से निपट सके। निवेशकों को सिर्फ एक साल के रिटर्न को देखकर निवेश करने से बचना चाहिए, क्योंकि ऐतिहासिक डेटा बताता है कि वोलेटाइल टेक सेक्टरों में अक्सर वे निवेशक फंस जाते हैं जो थीम के चरम पर प्रवेश करते हैं। प्रोफेशनल सलाह यही है कि यूएस एक्सपोजर के लिए कम लागत वाले इंडेक्स ट्रैकिंग पर ध्यान केंद्रित करें और इमर्जिंग मार्केट के विदेशी फंड्स को कोर होल्डिंग के बजाय टैक्टिकल, हाई-रिस्क पोजीशन के तौर पर देखें।
