देश के 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड (Yield) उछलकर **7.47%** पर पहुंच गए हैं, जो पिछले **3** सालों का सबसे ऊंचा स्तर है। इस हलचल का असर गिल्ट फंड्स (Gilt Funds) की NAV पर दिख रहा है, और मार्केट एक्सपर्ट्स के बीच निवेश की सही रणनीति को लेकर दो राय बनी हुई है।
बॉन्ड मार्केट में इन दिनों काफी उथल-पुथल मची है। 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 7.47% तक पहुंच गई है। गिल्ट फंड्स मुख्य रूप से सरकारी सिक्योरिटीज में निवेश करते हैं, और बॉन्ड की कीमतों और यील्ड के बीच उल्टा संबंध होता है। जब यील्ड बढ़ती है, तो बॉन्ड की कीमतें घटती हैं, जिसका सीधा असर फंड्स की नेट एसेट वैल्यू (NAV) पर पड़ता है।
क्यों बढ़ रही है यील्ड?
इस तेजी के पीछे कई वैश्विक कारण हैं। कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें $110 प्रति बैरल के पार जाने और US ट्रेजरी यील्ड्स में बढ़ोतरी ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। महंगाई की आशंका और ब्याज दरों के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बॉन्ड बाजार पर दबाव बना रही है।
एक्सपर्ट्स की दो राय
- निवेश का मौका: बाजार के एक धड़े का मानना है कि RBI द्वारा दरों में बढ़ोतरी का बड़ा असर पहले ही कीमतों में आ चुका है। उनका तर्क है कि रेपो रेट और 10 साल की यील्ड के बीच का अंतर ऐतिहासिक औसत से अधिक है, इसलिए यील्ड्स के और ऊपर जाने की गुंजाइश सीमित है। ऐसे में 'स्टैजर्ड एंट्री' (Staggered entry) यानी टुकड़ों में निवेश करने की सलाह दी जा रही है।
- सावधानी बरतने की सलाह: वहीं, कुछ फंड मैनेजर्स का मानना है कि अभी थोड़ा रुकना बेहतर है। उनका कहना है कि सरकारी उधारी कार्यक्रम और महंगाई के दबाव के कारण बॉन्ड कीमतें अभी और गिर सकती हैं।
लंबी अवधि का नज़रिया जरूरी
गिल्ट फंड्स में क्रेडिट रिस्क तो बेहद कम होता है, लेकिन ये ब्याज दरों के प्रति बहुत संवेदनशील (Sensitive) होते हैं। इसे 'ड्यूरेशन' (Duration) के जरिए समझा जाता है। इसीलिए फाइनेंशियल एडवाइजर्स हमेशा 7 से 9 साल का लंबा नजरिया रखने वाले निवेशकों को ही इसमें पैसा लगाने की सलाह देते हैं, ताकि लंबे समय में ब्याज से होने वाली कमाई बाजार के शॉर्ट-टर्म झटकों को कवर कर सके।
