साल 2026 की शुरुआत से ही Flexi-cap Mutual Funds में निवेशकों का जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। जनवरी से जुलाई के बीच इन फंड्स में करीब **₹50,000 करोड़** का निवेश आया है, जो पिछले साल के मुकाबले **27%** की बड़ी बढ़त है।
भारतीय निवेशक अब फिक्स्ड कैटेगरी के बजाय 'लचीलेपन' को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। Association of Mutual Funds in India (Amfi) के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल जनवरी से जुलाई के बीच Flexi-cap फंड्स में ₹49,915 करोड़ का नेट इनफ्लो आया है। यह आंकड़ा साल 2025 की समान अवधि के ₹39,187 करोड़ से 27% अधिक है।
निवेशक क्यों हैं Flexi-cap के दीवाने?
पारंपरिक फंड्स के विपरीत, Flexi-cap स्कीम में फंड मैनेजर को बाजार की चाल के हिसाब से पोर्टफोलियो बदलने की पूरी आजादी होती है। चाहे बाजार का माहौल अनिश्चित हो या ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव, ये फंड्स बड़े, मिड और स्मॉल कैप के बीच पूंजी को शिफ्ट करके रिस्क मैनेज करने में माहिर होते हैं।
इस बढ़ती लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जुलाई 2026 तक इन फंड्स में फोलियो (Folios) की संख्या 2.44 करोड़ पहुंच गई है, जिसमें सिर्फ एक साल में 50 लाख नए खाते जुड़े हैं। फिलहाल, इस सेगमेंट का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) ₹6 ट्रिलियन के पार निकल चुका है और यह कुल इक्विटी इनफ्लो का 19% हिस्सा है।
नई योजनाओं का दौर
निवेशकों की मांग को देखते हुए फंड हाउस लगातार नए फंड ऑफर (NFO) ला रहे हैं। Quantum Mutual Fund ने हाल ही में अपनी नई स्कीम लॉन्च की है, वहीं AlphaGrep Flexi Cap Fund ने भी अगस्त में अपना NFO पूरा किया है। यह साफ दिखाता है कि एक्टिव मैनेजमेंट और सही स्टॉक पिकिंग की मांग मार्केट में अभी भी बरकरार है।
सतर्क रहने की जरूरत
लचीलापन जहां इसका सबसे बड़ा फायदा है, वहीं इसमें जोखिम भी जुड़े हैं। चूंकि ये फंड्स स्मॉल और मिड-कैप में भी निवेश कर सकते हैं, इसलिए इनमें वोलेटिलिटी (Volatility) अधिक होती है। इसके अलावा, फंड साइज बहुत बड़ा होने पर मैनेजर की चुस्ती (Agility) पर असर पड़ सकता है। निवेशकों को यह हमेशा याद रखना चाहिए कि Flexi-cap फंड का प्रदर्शन पूरी तरह से फंड मैनेजर के निर्णय लेने की क्षमता पर टिका होता है।
